यह होता है राजा का धर्म

यह कहानी न नयी है न पुरानी, लेकिन आज के राजनीतिक परिदृश्य पर फिट बैठती है. एक चौड़ी, गहरी और खतरनाक नदी के किनारे एक नाव लेकर एक नाविक चिल्ला-चिल्लाकर लोगों को बुला रहा था-आओ-आओ, मेरी नाव में बैठो. मैं सबको उस पार मुफ्त में ले जाऊंगा. वहां सब्जबाग है, केवल ऐश ही ऐश है. […]

यह कहानी न नयी है न पुरानी, लेकिन आज के राजनीतिक परिदृश्य पर फिट बैठती है. एक चौड़ी, गहरी और खतरनाक नदी के किनारे एक नाव लेकर एक नाविक चिल्ला-चिल्लाकर लोगों को बुला रहा था-आओ-आओ, मेरी नाव में बैठो. मैं सबको उस पार मुफ्त में ले जाऊंगा. वहां सब्जबाग है, केवल ऐश ही ऐश है. कोई दु:ख नहीं है, सब राजा बन जाओगे.

लोग आंखें मूंद कर उस पर विश्वास कर उसकी नाव में बैठ गये. नाविक नाव लेकर बीच मझधार तक पहुंचा, तब उस पर सनक सवार होती है- ना जी ना, अब तो मैं बड़ा जहाज चलाऊंगा. और बड़े जहाज तक पहुंचने के लिए पानी में कूद जाता है. नाव पर सभी लोग मरने के लिए पीछे छूट जाते हैं. यह नाविक कोई और नहीं बल्कि केजरीवाल है. राजा का धर्म है हर हाल में प्रजा और देश का भला करना, बीच मझधार में छोड़ कर भाग नहीं जाना.

मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव, ई-मेल से

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