‘जे नाची से बाची’
डॉ अनुज लुगुन सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया मुंडारी कहावत है- ‘सेन गी सुसुन, काजी गी दुरंग, डूरी गी दुमंग’. अर्थात् उनका ‘चलना ही नृत्य है, बोलना ही गीत है और शरीर ही मांदल है’. यह आदिवासी जीवन दर्शन है. आदिवासी समाज से बाहर इस दर्शन की व्याख्या नहीं हुई. ज्यादा-से-ज्यादा समाजशास्त्रियों या […]
डॉ अनुज लुगुन
सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया
मुंडारी कहावत है- ‘सेन गी सुसुन, काजी गी दुरंग, डूरी गी दुमंग’. अर्थात् उनका ‘चलना ही नृत्य है, बोलना ही गीत है और शरीर ही मांदल है’. यह आदिवासी जीवन दर्शन है.
आदिवासी समाज से बाहर इस दर्शन की व्याख्या नहीं हुई. ज्यादा-से-ज्यादा समाजशास्त्रियों या अध्येताओं ने इतना ही कहा कि आदिवासी समाज ‘उत्सवधर्मी’ समाज है. कुछ विद्वानों ने तो इनकी उत्सवधर्मिता को उनके पिछड़ेपन का कारण भी माना है. आधुनिक मनुष्य समाज में आदिवासी समाज ही ऐसा विलक्षण उदाहरण है, जहां नृत्य को लेकर कोई प्रदर्शनप्रियता नहीं है, न ही नृत्य को लेकर सामंती आग्रह है और न ही लैंगिक विभेद.
गीत और मांदल आदिवासियों की ताकत हैं और उनका अध्यात्म भी. ‘अखड़ा’ न केवल विश्व का सबसे बड़ा रंगमंच है, बल्कि शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य देनेवाला बेहतरीन चिकित्सालय भी है. आदिवासियों के विद्रोह की कथा तो कही-सुनी जाती है, लेकिन उनके उत्सव की नहीं, जबकि एक के बिना दूसरा अधूरा है. चाहे औपनिवेशिक समय में बिरसा मुंडा का उलगुलान हो या आजाद भारत में आदिवासी प्रतिरोध, हमेशा उनके एक कंधे पर मांदल रहा है, दूसरे कंधे पर तीर-धनुष और होठों पर गीत. प्रतिरोध की यह संस्कृति मानव इतिहास में विलक्षण है. इस अद्वितीय संस्कृति से दुनिया को परिचित करानेवाले विद्वान् संस्कृतिकर्मी रहे हैं डॉ रामदयाल मुंडा. स्वतंत्र भारत में डॉ एकमात्र रामदयाल मुंडा का सभी आदिवासी समुदायों में समान रूप से सम्मान था.
चाहे दक्षिण भारत हो, मध्य भारत हो या पूर्वोत्तर भारत, उनका समग्र सांस्कृतिक नेतृत्व था. भारतीय राजनीति में जो केंद्रीय आदिवासी नेतृत्व उभर नहीं सका, उसकी भरपाई उन्होंने एक सांस्कृतिक नेता के रूप में की. उनके नेतृत्व में ही पहली बार ‘ऑल इंडिया ट्राइबल लिटरेरी फोरम’ का गठन हुआ. वे इसके संस्थापक अध्यक्ष भी रहे. वे अंतरराष्ट्रीय आदिवासी सम्मेलनों के भागीदार रहे. संयुक्त राष्ट्र में आदिवासी प्रतिनिधि बन कर गये. वे भाषाविद् तो थे ही, उन्होंने अपने चिंतन को वृहद लेखन के माध्यम से प्रस्तुत किया.
उनका लेखन एक साथ अंगरेजी, हिंदी, नगपुरिया और मुंडारी भाषाओं में फैला हुआ है. झारखंड के संदर्भ में वे आदिवासी-सदान संस्कृति के विद्वान विश्लेषक थे. उन्होंने झारखंड में कभी भी सांप्रदायिक और साम्राज्यवादी शक्तियों को स्वीकार नहीं किया. उनकी आत्मा गीतों में बसती थी, मांदल और बांसुरी में बसती थी. वे जादुई गायक और वादक भी थे.
उन्हीं की लिखी एक कविता है- ‘पोकेला गांव का नाम लेकर/ मैं कहां-कहां खोजता फिरा/मगर आज खोजते-खोजते मैं पहुंच ही गया/ मैं धान-चावल नहीं खोजता/ मैं अरखी-इली नहीं खोजता/ मैं गीतों की मजदूरी करता हूं/ बाजे की गूंज सुन कर/ मैं जोगी की तरह पहुंच गया…’
यह कवि की निजी भावाभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि एक समाज की सामूहिक चेतना है. यह अर्थव्यस्था की आदिम व्यवस्था की प्रतीति नहीं, बल्कि श्रम के मूल्य का नया नजरिया है. मुंडारी का एक पुरखा गीत है- ‘सिंगी दोबू सियु: कमिया/ अयुब नपंग दुमंग दंगोड़ी’, अर्थात् ‘दिनभर हल चलायेंगे, काम करेंगे, और रातभर मांदल की थाप होगी.’ यहां श्रम और आनंद नाभिनालबद्ध हैं.
लोग कई कोस जंगलों-पहाड़ों से नृत्य के लिए अखड़ा में आते हैं और अपनी सहजीविता को मजबूती देते हैं. आदिवासियों की जैविक आकांक्षाओं के साथ डॉ मुंडा उस दुनिया से आजीवन संवाद करते रहे, जो आदिवासियों को असभ्य समझती है.
अंतराष्ट्रीय फिल्म जगत में आदिवासी सौंदर्यबोध के लिए जाने जानेवाले प्रसिद्ध फिल्मकार मेघनाथ और बीजू टोप्पो के निर्देशन में पिछले सप्ताह डॉ रामदयाल मुंडा की जीवनी पर आधारित फिल्म रिलीज हुई है- ‘नाची से बाची’. अर्थात् ‘जो नाचेगा वही बचेगा’. यह डॉ मुंडा का कथन है.
यह संपूर्ण मनुष्यता के सांस्कृतिक परिष्कार का कथन है. झारखंड के सुदूर जंगली गांव दिउड़ी से अमेरिका के मिनसोटा यूनिवर्सिटी की गौरवमयी यात्रा में डॉ मुंडा ने आदिवासियत के इस विचार को विस्मृत होने से बचाया, और दुनिया के सामने उन्होंने इस दर्शन की व्याख्या भी प्रस्तुत की.
लोग विदेश जाकर आदिवासियों की दरिद्रता की व्याख्या करते हैं, लेकिन डॉ मुंडा ने उनके दर्शन और गौरव की बात कही. जब तक वे अमेरिका में रहे, एक संस्था की तरह रहे और आदिवासियत को प्रसारित करते रहे. लेकिन, उन्हें उनकी धरती अपनी ओर खींचती थी और वे अमेरिका में प्रोफेसर की नौकरी छोड़ कर वापस आ गये. यहां उन्होंने झारखंड आंदोलन को सांस्कृतिक दिशा दी. सरहुल, करमा इत्यादि त्योहारों का संगठन हुआ. रांची में जनजातीय भाषा विभाग की स्थापना हुई और शोध कार्य शुरू हुए.
‘नाची से बाची’ न केवल उपेक्षित आदिवासी समाज के चिंतन को वैश्विक मंच देता है, बल्कि आनेवाली समूची मानवता के लिए इतिहास है. पूंजीवाद और बाजारवाद की गिरफ्त में उलझा मानव समाज जब भी ठोकरें खायेगा, उसे डॉ मुंडा का यह कथन याद आयेगा- ‘जे नाची से बाची’.
