सबकी अभिव्यक्ति की भाषा बने, तभी विश्व भाषा बनेगी हिंदी

Hindi Diwas: दस जनवरी, 1975 को नागपुर में शुरू हुए पहले विश्व हिंदी सम्मेलन के पीछे यह सोच थी कि आने वाले दिनों में हिंदी वैश्विक स्तर पर स्थापित हो सके. वैश्विक स्तर पर सीमित ही सही, हिंदी का प्रसार तो हो रहा है. परंतु मोटे तौर पर देखें, तो इसके पीछे सांस्थानिक प्रयास कम, दुनियाभर में फैल रहे भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों का योगदान अधिक है.

Hindi Diwas: विश्व गुरु की अवधारणा पूरी तरह देशज है. हाल के कुछ वर्षों में देश की यह भावना बार-बार प्रकट हुई है. परंतु इस सम्मान को प्राप्त करने के लिए जो शर्तें होनी चाहिए, उनमें एक राष्ट्र की अपनी सम्माननीय भाषा को भी पूरा करना जरूरी है. भारत जैसे बहुभाषी देश में यह प्रश्न आवश्यक है कि राष्ट्र के ज्ञान, उसकी अभिव्यक्ति और उसके भविष्य की भाषा कौन-सी हो सकती है. राष्ट्रीय सोच इस प्रश्न के उत्तर में बिना किसी संकोच और देर के हिंदी का नाम ले सकती है. पर आज की विभाजनकारी राजनीति एवं वैचारिकी और इनसे प्रभावित मीडिया का एक बड़ा वर्ग शायद ही इसे स्वीकार कर सके. परंतु बहुभाषी भारतीय परंपरा और संस्कृति में भारत की स्वाभाविक स्थिति ही यह साबित करने के लिए काफी है कि विश्व गुरु के पायदान की ओर बढ़ रहे भारत की प्रमुख भाषा हिंदी ही हो सकती है.

दस जनवरी, 1975 को नागपुर में शुरू हुए पहले विश्व हिंदी सम्मेलन का उद्देश्य पता नहीं हिंदी को विश्व गुरु वाले राष्ट्र की प्रमुख भाषा के रूप में स्थापित करना था या नहीं, पर उसके पीछे यह सोच अवश्य थी कि आने वाले दिनों में हिंदी वैश्विक स्तर पर स्थापित हो सके. विश्व हिंदी दिवस हर वर्ष इसी सोच और उद्देश्य को याद दिलाने का प्रयास करता है. वैश्विक स्तर पर सीमित ही सही, हिंदी का प्रसार तो हो रहा है. परंतु मोटे तौर पर देखें, तो इसके पीछे सांस्थानिक प्रयास कम, दुनियाभर में फैल रहे भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों का योगदान अधिक है. हिंदी में और हिंदी के लिए काम कर रहे प्रवासी भारतीयों और हिंदी प्रेमियों को मंच देने और उनके वैश्विक प्रयासों को मर्यादित ही सही, मान्यता दिलाने में विश्व हिंदी सम्मेलनों ने जरूर सहयोग किया है. विश्व गुरु बनने के लिए भारत के पास अपनी एक ऐसी भाषा होनी चाहिए, जिसे समूचा देश स्वीकार कर सके, वह परंपरा की वाहक भी हो, संस्कृति की भाष्यकार भी हो और आधुनिक संदर्भों से भी स्वयं को गहराई से जोड़ सके. जिसमें समूचे राष्ट्र को स्वयं को अभिव्यक्त करने में गर्व की अनुभूति हो. जो आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का भी माध्यम बन सके, जिसमें वैश्विक स्तर का साहित्य हो. जो राजकाज की भी भाषा हो, जिसके जरिये राष्ट्र अपनी राष्ट्रीय आवाज को उठा सके.

आज की विश्व भाषा अंग्रेजी को देखिए. भौगोलिक प्रसार की दृष्टि से देखें, तो उसकी तुलना में सबसे ज्यादा भूभाग पर स्पेनिश बोली जाती है. बोलने वाले व्यक्तियों के लिहाज से देखें, तो उसकी तुलना में मंदारिन, यानी चीनी भाषा बोलने वालों की संख्या कहीं ज्यादा है. परंतु वैश्विक राजनय के लिहाज से देखें, तो अंग्रेजी पहले नंबर पर है. दुनियाभर के देशों के आपसी संपर्क की भाषा अंग्रेजी है. इसके बावजूद देखें तो रूसी, फ्रेंच, इटैलियन, स्पेनिश, अरबी आदि भाषाएं अपने ही राष्ट्रों में राष्ट्रीय गर्व और व्यवहार की भाषा हैं. राष्ट्रीय गर्व और व्यवहार के नजरिये से देखें, तो अपनी हिंदी अपने देश में पिछड़ती नजर आती है. विश्व भाषा होने के लिए किसी भाषा में वैश्विक स्तर का स्तरीय साहित्य भी होना चाहिए. पर अपनी हिंदी को देखिए. यहां ‘मैं तुझे मीर कहूं, तुम मुझे गालिब कहो’ के अंदाज में पुस्तकें लिखी जा रही हैं और उनकी समीक्षाएं हो रही हैं.

वर्ष 2009 के विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों के अनुसार आज प्राध्यापक बनने के लिए पुस्तकें लिखना और पीएचडी करना जरूरी योग्यता हो गयी है. इसके चलते आजकल हिंदी में पुस्तकें लिखने का फैशन बढ़ गया है. अपनी वैचारिकी वाली राजनीतिक ताकतों के जरिये पुस्तकों का विमोचन और लोकार्पण भी खूब हो रहा है. पर इसका उद्देश्य ज्ञान और अभिव्यक्ति के झंडे गाड़ना कम, राजनीतिक आकाओं को खुश करना और उसके जरिये प्राध्यापक बनना या ऐसी ही नौकरियां प्राप्त करना रह गया है. शोध भी कैसे हो रहे हैं, इसकी जानकारी हर प्रबुद्ध व्यक्ति को है. पुस्तक छापने वाले कुछ हिंदी प्रकाशकों की ईमानदारी भी इस कर्म में लगे हर व्यक्ति को पता है. प्रश्न यह है कि जिस हिंदी में इतनी अराजकता हो, क्या उससे विश्व भाषा बनने की आशा की जा सकती है.

प्रश्न यह भी है कि क्या ऐसी स्थिति में हिंदी में वैश्विक स्तर की साहित्य रचना हो सकती है? ऐसा नहीं कि समूचा हिंदी परिदृश्य ही ऐसा है, हिंदी के बीच सरोकारी लेखन, ज्ञानाभिव्यक्ति और स्तरीय साहित्य लेखन के भी प्रयास जारी हैं, परंतु वे आपाधापी और लूटमलूट वाली हिंदी प्रक्रिया के बीच ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं. शायद यही कारण है कि हिंदी के विरोध में उठने वाली राजनीति प्रेरित आवाजों का समवेत प्रतिकार नहीं हो पाता. इसलिए हिंदी के बरक्स अंग्रेजी अब भी भारत के प्रभु वर्ग और शिष्ट समाज के साथ ही ज्ञान परिवार की प्रभावी भाषा बनी हुई है. निश्चित तौर पर भारतीयों के प्रसार के चलते हिंदी कामचलाऊ बोलचाल की भाषा के रूप में विश्व के किसी भी कोने में अपनी उपस्थिति जता सकती है. इस तरह उसका प्रचार तो हो सकता है, पर वह संस्कृति, चिंतन और राजकाज की भाषा नहीं बन सकती है. इस संदर्भ में विश्व हिंदी दिवस पर हिंदी के कर्णधारों को सोचना होगा कि क्या इसी हिंदी के सहारे वे विश्व भाषा के पायदान को छू पायेंगे, बिना स्तरीय साहित्य के वैश्विक सम्मति और सम्मान प्राप्त कर पायेंगे? (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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