।।कमलेश सिंह।।
(इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल के प्रबंध संपादक)
अन्ना हजारे फिर दिल्ली आये तो ‘मैं अन्ना हूं’ की टोपी लगाये बहुत कम लोग आये. पिछली बार आंधी की तरह लोग उमड़े थे, इस बार वह समर्थन बगुले की तरह उड़ लिया. ममता बनर्जी की सभाओं में जितने लोग आते थे, उससे भी कम लोग दिल्ली के रामलीला मैदान पहुंचे. ममता ने हिम्मत की. वे पहुंचीं, पर नदारद भीड़, तो अन्ना भी नदारद. तो क्या हो गया अन्ना की आंधी को, देश के नये गांधी को? जनलोकपाल नहीं बना. जो लोकपाल बिल पास हुआ, उसमें इतने झोल हैं कि चुननेवाली समिति से लोग ऐसे झड़ रहे हैं, जैसे अंधड़ में आम का मंजर झड़ जाता है.
लोकपाल का टिकोला आया नहीं, पर मंजर देख कर ही अन्ना ने उसे आशीर्वाद दे दिया था. अब वापस कैसे लेते? चेले अरविंद केजरीवाल ने जब दिल्ली में चुनाव लड़ा, तो अन्ना ने आशीर्वाद देने से मना कर दिया था. वह अपने बयान पर टिके रहे कि पक्ष-पार्टी से हमेशा दूर रहेंगे. अरविंद को पत्र लिख कर अपने नाम का दुरुपयोग करने के खिलाफ आगाह किया. अरविंद ना सिर्फ लड़े, बल्कि जीते भी. सरकार बनायी और 49 दिनों में अपनी छाप छोड़ कर गये. अब वे देश भर में अपनी पहचान बनाने में लगे हैं.
अन्ना रातोंरात अपना पक्ष-पार्टी वाला बयान रालेगण सिद्घि के अपने आश्रम के ताक पर रख आये और ममता बनर्जी को अपना आशीर्वाद दे दिया. उनकी तसवीरें ममता के चुनावी पोस्टरों से झांकने लगीं. तब वह बगलें नहीं झांक रहे थे. खुल कर राजनीति के मैदान में आने का अफसोस तब हुआ, जब उनकी पुरानी अनशन भूमि रामलीला मैदान में लोग नहीं आये. अन्ना भूल गये कि जनसैलाब उस बुजुर्ग के लिए आता था, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में अपनी जान पर खेल जाता था. उस नेता के लिए नहीं जो ममता बनर्जी के तृणमूल कांग्रेस का तुरूप का पत्ता बनना चाहता है. अभी अन्ना गायब हैं और अपनी गलतियों पर पछता रहे होंगे. देश भी पछता रहा है कि आखिर क्यों हर आंदोलन, जो बड़ी उम्मीदें लेकर आता है, फुस्स हो जाता है. देकर कुछ नहीं जाता है, कुछ पल के लिए उभरे उफान के सिवा.
जेपी का आंदोलन संपूर्ण क्रांति का सपना जगा गया था. इंदिरा गांधी जैसी नेत्री की नींदें उड़ा गया था. जनता पार्टी की सरकार बना गया था और देश को एक विकल्प दे गया था. फिर क्या हुआ उस विकल्प का? लोहिया के उत्तराधिकारी, जेपी के पुजारी कांग्रेस के साथ हो लिये हैं. कई टुकड़ों में बंट गये हैं, टुकड़ों पर पल रहे हैं. जैसे चलाया जा रहा है, वैसे चल रहे हैं. संपूर्ण क्रांति एक भ्रांति बन कर रह गयी. दूसरा सबसे बड़ा आंदोलन विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में उभरा था. बोफोर्स पर चढ़ कर लोकप्रिय राजीव गांधी की सरकार को धूल चटानेवाले वीपी सिंह अपने आखिरी दिनों में सोनिया गांधी के सबसे निकट थे. भ्रष्टाचार के खिलाफ उनके आंदोलन से चढ़ान पर आये उनके साथी नेता भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रहे थे. मंडल कमीशन लागू नहीं करते, तो इतिहास में नाम तक दर्ज नहीं होता. भ्रष्टाचार नये रिकॉर्ड बनाता रहा. बीस साल बाद देश आजिज आ गया और आसमान की ओर निहार रहा था कि कोई आये, हमारी सोई हुई दुम को हिला जाये. ऐसे में अन्ना हजारे आये और देश उनके पीछे खड़ा हो गया. लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात.
अन्ना आंदोलन के बाद भी घोटाले पर घोटाले होते रहे. अब चुनाव आये हैं, तो दागी को टिकट देने में कोई दाग नहीं है. बाहुबलियों को टिकट मिल रहा है. इधर पवन बंसल, उधर येदियुरप्पा, इधर ए राजा, हर तरफ वही पुराना बाजा. कोई ईमानदारी के नाम पर चुनाव लड़ रहा है, पर मौका मिलते ही समझौते कर रहा है. जो विकास के नाम पर लड़ रहा है, उसे भी जिताऊ उम्मीदवार चाहिए. दुश्मनों से लड़ नहीं सकते, तो हाथ मिला लेते हैं. लोग चाहें तो हथेली पर कमल उगा सकते हैं. ईमानदारी और सिद्घांत बाद में, पहले समीकरण. क्योंकि चुनाव में वोट गिने जाते हैं, ईमानदारी और सिद्घांत तौले नहीं जाते. हर आंदोलन के लिए ये दुखद खबर है कि आंदोलन के साथ उसकी आत्मा भी मर जाती है. सार्वजनिक जीवन की स्वच्छता वापस घर जाती है. जो अचानक जागृत हो गये थे, फिर से सो जाते हैं. हम वापस पहले जैसे हो जाते हैं.
आप चाहें तो बता सकते हैं कि अन्ना के पलट जाने पर भी आप नहीं पलटे. वोट में नोट के खेल और बाहुबल का तालमेल आप चाहें तो अस्वीकार कर दें. आंदोलनों का हाल आपने देख लिया है. एक आंदोलन बिना नारे, बिना धरने और बिना रैलियों के आ सकता है. पोलिंग बूथ के एकांत में. किसी को गुस्से में अंगुली दिखाये बिना. उसी अंगुली से एक बटन दबा कर आप एक नये आंदोलन को स्विच ऑन कर सकते हैं. इस अनोखे आंदोलन में भाग लीजिए.
