आम आदमी के सपनों का मजाक!

आजादी के बाद से हिंदुस्तान में लगभग एक ही दल का शासन रहा है. इस लंबे काल खंड के कुछ वर्षो को छोड़ दें, तो भारतीय लोकतंत्र पुरानी पगडंडियों पर ही चलता रहा है. हालांकि इस सच्चाई से मुंह फेरना मुनासिब नहीं होगा कि 1947 के भारत और 2014 के भारत में बड़ा फर्क है. […]

आजादी के बाद से हिंदुस्तान में लगभग एक ही दल का शासन रहा है. इस लंबे काल खंड के कुछ वर्षो को छोड़ दें, तो भारतीय लोकतंत्र पुरानी पगडंडियों पर ही चलता रहा है. हालांकि इस सच्चाई से मुंह फेरना मुनासिब नहीं होगा कि 1947 के भारत और 2014 के भारत में बड़ा फर्क है. सच्चाई यह भी है कि कुछ रस्म-रिवाज समय के साथ-साथ परंपरा और संस्कृति का रूप ले लेते हैं. इस वक्त देश की राजनैतिक संस्कृति ‘कांग्रेस कल्चर’ में रंगी है. मगर लोग अब इस कल्चर से ऊबने लगे हैं.

कहने को तो यह आम आदमी की चाहत है कि यह संस्कृति बदलनी चाहिए और ‘कांग्रेस मुक्त’ भारत की बातें होने लगी हैं. वैसे देश अभी ब्रिटिश संस्कृति से भी पूरी तरह आजाद नहीं हो पाया है. कई संवैधानिक गतिविधियों में इस संस्कृति की झलक दिखती है. सवाल यह पैदा होता है कि आम आदमी को राजनैतिक संस्कृति में बदलाव क्यों चाहिए?

क्या आनेवाली संस्कृति वंशवाद से ग्रसित नहीं होगी? क्या आने वाला राजनेता स्वार्थ, लोभ, मोह आदि से पूरी तरह से मुक्त होगा? क्या उसमें सत्ता में बने रहने की लालसा नहीं होगी? क्या वह हिंदुस्तानी आबो-हवा और उसके प्रभाव से अछूता होगा? आम आदमी तो लोगों की भूख मिटाने वाला किसान, सड़क की पटरियों पर सोने वाला दिहाड़ी मजदूर है, जो अपनी और अपने बच्चों की जरूरतें पूरी करने में ही खोया है. उसके लिए बदलाव कल भी बेमानी था और आज भी है. बदलाव के नाम पर अपना उल्लू सीधा करनेवालों ने आम आदमी का मुखौटा लगा रखा है. देश की जनता की पीड़ा समझने के लिए क्या राजनैतिक टोपी बदलना जरूरी है? गरीबों को अनर्गल सपने दिखा कर कम से कम गरीबी का मजाक तो न बनायें!

एमके मिश्र, रांची

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