।। पंकज चतुर्वेदी।।
(स्वतंत्र पत्रकार)
बस्तर के जिस इलाके में सुरक्षा बलों का खून बहा है, यदि वहां की प्राकृतिक सुंदरता पर एक नजर डालें, तो वहां से लौटने का मन नहीं करेगा. जगदलपुर से सुकमा जानेवाली सड़क पर पेड़-पहाड़, झरने-नदी सब कुछ हैं. यहां कांगेर घाटी जैसी दुनिया की अनूठी प्रागैतिहासिक काल की लाइम-केव है. अगर कुछ नहीं है तो- सुकून. स्थानीय समाज दो पाटों के बीच पिस रहा है और उनके घुटनभरे पलायन की ही परिणति है कि वहां की कई लोक बोलियां लुप्त हो रही हैं. धुरबी बोलनेवाले हल्बीवालों के इलाकों में बस गये हैं, तो उनके संस्कार, लोक-रंग, बोली सब कुछ उनके अनुरूप हो रहे हैं. इन सबके बीच इंसानी जिंदगी के साथ जो कुछ भी अकल्पनीय नुकसान हो रहे हैं, इसके लिए स्थानीय प्रशासन की कोताही ही जिम्मेवार है. नक्सलियों का अपना खुफिया तंत्र सटीक है, जबकि प्रशासन खबर पाकर भी कार्रवाई नहीं करता. खीङो सुरक्षा बलों की कार्रवाई में स्थानीय निरीह आदिवासी ही शिकार बनते हैं और यही नक्सलियों के लिए मजबूती का आधार है.
बस्तर के संभागीय मुख्यालय जगदलपुर से सुकमा की ओर जानेवाले खूबसूरत रास्ते का विस्तार आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा तक है. अभी मार्च के पहले हफ्ते में ही कई स्थानीय अखबारों और न्यूज चैनलों ने खबर दिखायी थी कि गीदम से झीरम के बीच नक्सलियों की गतिविधियां दिख रही हैं. केंद्रीय गृह मंत्रलय ने भी नक्सली हिंसा की चेतावनी भेजी थी. सुबह साढ़े आठ बजे तोंगपाल थाने से सीआरपीएफ और जिला पुलिस का एक दस्ता निकलता है और महज चार किमी आगे ही उन पर हमला हो जाता है. करीब तीन सौ नक्सली मुख्य सड़क से कुछ दूरी पर घात लगाये बैठे थे. उन्होंने जिस तरह से वहां विस्फोटक लगाये थे, इसमें कई घंटे का समय लगना लाजमी है. इसके बावजूद इसकी कोई खुफिया खबर चार किलोमीटर दूर तक नहीं पहुंची. जिस तरह से नक्सलियों ने खेत की मेड़ पर कब्जा कर विस्फोटक लगाया था और पीछे आ रही पार्टी को भी रोक लिया था, साफ है कि सीआरपीएफ की टुकड़ी के थाने से निकलने के पल-पल की खबर उन्हें मिल रही थी.
2009 में राजनांदगांव हमले के बाद नक्सलियों का यह 14वां हमला है. केंद्रीय गृह मंत्रलय की 2006 की ‘आंतरिक सुरक्षा की स्थिति’ रिपोर्ट में स्पष्ट बताया गया था कि देश का कोई भी हिस्सा नक्सल गतिविधियों से अछूता नहीं है. सरकार ने उस रिपोर्ट में स्वीकारा था कि देश के दो-तिहाई हिस्से पर नक्सलियों की पकड़ है. गुजरात, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर में भी कुछ गतिविधियां नजर आयी हैं. दो प्रमुख औद्योगिक बेल्टों- ‘भिलाई-रांची-धनबाद-कोलकाता’ और ‘मुंबई-पुणो-सूरत-अहमदाबाद’ में इन दिनों नक्सली लोगों को जागरूक करने का अभियान चला रहे हैं. इस रपट पर कार्रवाई, खुफिया सूचना, दूरगामी कार्ययोजना का कुछ पता नहीं है.
एक तरफ सरकारी लूट व जंगल में घुस कर उस पर कब्जा करने की बेताबी है, तो दूसरी ओर आदिवासी क्षेत्रों के संरक्षण का भरम पाले खून बहाने पर बेताब ‘दादा’ लोग. बीच में फंसी है सभ्यता, संस्कृति और लोकतंत्र की साख. नक्सल आंदोलन के जवाब में ‘सलवा जुडूम’ का स्वरूप कितना बदरंग हुआ था; यह सबके सामने है. बंदूकों से अपनों का खून तो बहाया जा सकता है, पर देश नहीं बनाया जा सकता. बंदूकों को नीचे करें, बातचीत के रास्तें निकालें, समस्या की जड़ में जाकर उसके हल की कोशिश करें, वरना सुकमा की दरभा घाटी या बीजापुर के आर्सपेटा में खून अभी बहता रहेगा. साथ ही उन खुफिया अफसरों, वरिष्ठ अधिकारियों की जिम्मेवारी भी तय करने की जरूरत है, जिनकी लापरवाही के चलते एक ग्रामीण और 15 सुरक्षाकर्मी बेवजह मारे गये.
यह हमला हमारी सुरक्षा व्यवस्था व लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आये झोल को ठीक करने की चेतावनी है. दंडकारण्य में फैलती बारूद की गंध नीति-निर्धारकों के लिए सोचने का अवसर है कि नक्सलवाद को खत्म करने के लिए बंदूक का जवाब बंदूक से देना ही एकमात्र विकल्प है या फिर संवाद का रास्ता खोजना जरूरी है. आदिवासी क्षेत्रों की करोड़ों-अरबों की प्राकृतिक संपदा पर कब्जा जताने को आतुर पूंजीवादी घरानों का समर्थन करनेवाली सरकार 1996 में संसद द्वारा पारित आदिवासी क्षेत्रों के लिए विशेष पंचायत कानून (पेसा अधिनियम) को लागू करना तो दूर, उसे भूल ही चुकी है. इसके तहत ग्राम पंचायत को अपने क्षेत्र की जमीन के प्रबंधन व रक्षा करने का पूरा अधिकार था. इसी तरह परंपरागत आदिवासी अधिनियम, 2006 को संसद से तो पारित करवा दिया, पर उसका लाभ दंडकारण्य तक नहीं गया. कारण, वह बड़े धरानों के हितों के विपरीत है. यह सही समय है उन अधिनियमों के क्रियान्वयन पर विचार करने का, लेकिन हम बात कर रहे हैं कि उन क्षेत्रों में कैसे बजट कम किया जाये, क्योंकि उसका बड़ा हिस्सा नक्सली वसूल रहे हैं.
