।। एमजे अकबर।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
इराक युद्ध के दौरान अमेरिका के रक्षा मंत्री रहे डोनाल्ड रम्जफेल्ड ने कहा था कि आप उसी सेना को साथ लेकर लड़ते हैं, जो आपके पास है, उस सेना के साथ नहीं, जिसकी आप इच्छा रखते हैं. यह सामान्य कथन किसी रक्षा मंत्री की बुनियादी जिम्मेवारी को रेखांकित करता है- शांति काल में सेना के समुचित रख-रखाव और प्रशिक्षण सुनिश्चित करना ताकि वह लड़ाई के समय काम आ सके.
हर युद्ध अलग होता है. सेनाएं अगली लड़ाइयों की तैयारी करती हैं. वह पिछले युद्धों को नहीं दोहरातीं. सेनाओं के भिड़ने के पुराने ढंग अब इतिहास हो चुके हैं. ऐसा जरूरी नहीं कि शत्रु अब सैनिक की पोशाक में किसी निर्धारित युद्ध-क्षेत्र में दिखे. अब वह अलग सशस्त्र गिरोह है, जो आम लोगों के बीच माओ के प्रसिद्ध मुहावरे ‘पानी में मछली’ की तरह घुल-मिल जाता है. लेकिन माओ की गुरिल्ला मछलियां पूरा लाल थीं और एक कम्युनिस्ट पार्टी के कमान का अनुसरण करती थीं. पर, यह गिरोह अपनी उन्मादपूर्ण कल्पनाओं से संचालित होते हैं.
तालिबान और उसके सहयोगियों जैसे अंतरराष्ट्रीय गुट जब हमले कर सकते हैं, करते हैं, और जब ऐसा नहीं कर पाते, तो आराम करते हैं. यह संघर्षण का युद्ध है. उनके पास कोई तोपखाना या वायु सेना नहीं है, लेकिन संख्या, प्रेरणा, गोला-बारूद, उद्देश्य और अमूल्य संसाधन व समय है. इन तौर-तरीकों ने सोवियत संघ और अमेरिकानीत नाटो को अफगानिस्तान से विदा किया, जोकि एक उल्लेखनीय सैन्य-उपलब्धि है. राजनीतिक रूप से, वे पाकिस्तान और अफगानिस्तान को धर्मतंत्र में बदलने के लिए एक धर्म युद्ध लड़ रहे हैं, जो बढ़ते हुए भारत में कश्मीर व चीन में ङिानजियांग सहित मध्य एशिया के बहुत से ‘स्तानों’ को आगोश में ले लेगा, जो अभी भी धर्मतंत्र में भरोसा नहीं करते. नजर आ रहे विरोधाभासों से धोखा खा जाना आसान है. भले ही तालिबान और लश्कर-ए-तैयबा पाकिस्तानी और अफगानिस्तानी राज्य का चरित्र बदलने का इरादा किये हुए हैं, लेकिन भारत के साथ संघर्ष में वे पुराने और लंबे युद्ध में आतंकी सहायक के रूप में काम कर सकते हैं. लेकिन, उनके लिए यह दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. उन्हें बिना किसी भय के अपनी रणनीति को विस्तार देने की आजादी है. अखबारों ने यह संकेत दे ही दिया है कि दक्षिण और मध्य एशिया से नाटो के हटने का क्या मतलब है. वहां विजय का माहौल है, कट्टरपंथी ताकतें ठहर कर ‘मुसलिम धरती’ की ‘आजादी’ के लिए संगठित हो रही हैं. उन्हें धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा स्वीकार्य नहीं है. धर्मनिरपेक्ष समाज में भरोसा रखनेवाले भारत, पाकिस्तान या चीन के मुसलमान उनके लिए दोहरे दुश्मन हैं.
हम यह भली-भांति जानते हैं कि दो दशक पहले अफगानिस्तान से सोवियत संघ के हटने के बाद कश्मीर में हुए हमले के बाद भारतीय सेना बमुश्किल शांति बहाल कर सकी थी. आज चीन के साथ उनके राडार पर दक्षिणी रूस और मध्य एशिया भी हैं. कुछ दिन पहले ही चीन अभूतपूर्व आतंकी हमले से सन्न रह गया था. काले कपड़े पहने चाकूधारी हमलावरों ने एक रेलवे स्टेशन पर कई यात्रियों की हत्या कर दी थी. चीन के एकमात्र मुसलिम-बहुल प्रांत, ङिानजियांग में आतंकी घटनाओं में तेजी आयी है. बीजिंग परेशानियों को छुपाकर रखता है, लेकिन अब उसका नकाब उतरना शुरू हो गया है. यदि आतंकवादी पकिस्तान को अपने मजबूत ठिकाने के रूप में इस्तेमाल करते रहे, तो वह समय जल्द ही आयेगा जब चीन को इसलामाबाद के साथ अपने संबंधों के नफा-नुकसान का हिसाब करना होगा. दिल्ली के सामने सवाल बहुत सीधा है- आतंकी उकसावा हद से बढ़ने पर आतंक के विरुद्ध लड़ाई के पारंपरिक युद्ध में बदलने की स्थिति में क्या हम बहुआयामीय युद्ध के लिए तैयार हैं? जवाब निराशाजनक है. पिछले पांच सालों में एक ढुलमुल सरकार का सबसे अधिक दुष्प्रभाव जिन क्षेत्रों में पड़ा है, उनमें भारत की रक्षा तैयारी एक है. तनाव बढ़ने के बावजूद निष्क्रिय, मूर्छित व दुर्बल रक्षा मंत्री एके एंटनी के नेतृत्व में देश की सुरक्षा क्षमता कमजोर हुई है. हमारे उपकरण खराब हैं, जरूरी खरीदों को अनदेखा किया गया है. नौसेना के हौसले में कमी उस बीमारी का एक लक्षण-भर है, जो हमारी सुरक्षा के मुख्य केंद्रों को धीरे-धीरे पस्त कर रही है. कोई राजनीतिक जवाबदेही नहीं है. दुश्मन दरवाजे पर खड़ा है और एंटनी बेसुध पड़े हुए हैं.
अगला चुनाव यह तय तो करेगा ही कि जून तक देश को नया रक्षा मंत्री मिले. लेकिन सेना की पुनर्रचना का खर्च बहुत बड़ा है और समय कम है. हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं. आगामी दशक खतरों से भरा है. इससे निपटने के लिए विदेश नीति में भी नये पहल की जरूरत होगी. दुश्मन का दुश्मन सीधे दोस्त नहीं हो जाता, लेकिन वह युद्ध क्षेत्र में एक सहयोगी हो सकता है. भारत व चीन को एक-दूसरे की अपेक्षा से अधिक जरूरत हो सकती है. रूस को समझाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उसे मध्य एशिया के खतरों का अंदाजा है. वैसे तो, पाकिस्तान को भी बंदूकधारी कट्टरवादियों से सावधान रहना चाहिए, लेकिन समझ की ऐसी स्पष्टता के लिए शायद उसे और अधिक संकट की जरूरत है.
चीन व पकिस्तान को क्या करना है, यह उन्हें तय करना है. भारत को अपनी लड़ाई खुद लड़नी चाहिए. लेकिन लड़ाइयां सेनाएं लड़ती हैं. क्या हमारे पास वैसी सेना है, जिसकी हमें जरूरत है?
