भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) ने झारखंड के बारे में रिपोर्ट जारी की है. रिपोर्ट के अनुसार राज्य की 14 में से चार कंपनियों को 3352 करोड़ का घाटा हुआ है. घाटा मामूली नहीं है. बड़ा है. राज्य सरकार की जो कंपनियां फायदे में रही हैं, वह रकम भी मामूली है. ऐसे में राज्य कैसे चलेगा. राज्य सरकार ने इन कंपनियों में 6606 करोड़ का निवेश किया था. इस उम्मीद में कि फायदा होगा, लेकिन हुआ उलटा.
इतनी बड़ी राशि के निवेश के बावजूद अगर तीन हजार करोड़ से ज्यादा का घाटा होता है तो राज्य के लिए चिंता की बात है. अधिकांश निवेश यानी 98 फीसदी ऊर्जा के क्षेत्र में हुआ था. घाटा भी वहीं से ज्यादा हुआ है. घाटे के कारणों को तलाशना होगा. एक निजी कंपनी को थोड़ा भी घाटा होता है तो हाय-तौबा मच जाती है. कारण खोज कर दोषी को दंडित किया जाता है.
लेकिन जब मामला सरकारी कंपनियों का हो, तो कोई इसकी चिंता नहीं करता. सरकारी कंपनियों में पैसा जनता का लगा है, इसलिए अगर ये कंपनियां ढंग से काम नहीं करतीं, लगातार घाटे पर घाटे में चलती हैं तो जल्द से जल्द इसका फैसला करना चाहिए. राज्य की बिजली कंपनियों को घाटा होता है तो यह देखना चाहिए कि क्या निवेश सही तरीके से हो रहा है या गोइठा में घी डाला जा रहा है. जिन विद्युत कंपनियों में हर साल करोड़ों रुपये खर्च किये जा रहे हैं, फिर भी उत्पादन सुधर नहीं रहा, फायदा नहीं हो रहा, उन पर सरकार को कड़ा रुख अपनाना चाहिए. यह भी देखना चाहिए कि जिन कंपनियों को घाटा हुआ है, क्या उसके पीछे भ्रष्टाचार तो नहीं है. कहीं ऐसा तो नहीं कि भ्रष्टाचार के कारण कंपनियों का पैसा अधिकारियों-कर्मचारियों की जेब में चला गया हो.
सच यह है कि एक ओर निजी कंपनियों में कर्मचारी आठ घंटे जी-तोड़ मेहनत करते हैं. नहीं करने पर कार्रवाई होती है, नौकरी तक चली जाती है लेकिन सरकारी कंपनियों में काम करनेवाले अपनी मरजी से काम करते हैं. लक्ष्य पूरा हो या नहीं, वेतन तो मिलना ही है. कोई कार्रवाई तो होगी नहीं. अगर हुई, तो हड़ताल की धमकी देते हैं. यही वर्क कल्चर सरकारी कंपनियों को रसातल में ले जा रहा है. सरकार चेते. जो भी दोषी हैं, काम नहीं करते हैं, भ्रष्ट हैं, उन्हें दंडित करे, वरना सरकारी कंपनियों का यह घाटा पूरे राज्य को डुबो देगा.
