भारतीय बैंकिंग क्षेत्र पर संकट

।। डॉ अश्विनी महाजन।। (एसोसिएट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय) कुछ समय पहले रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने कहा था कि भारतीय बैंकिंग संकट में है, क्योंकि कुछ बड़ी कंपनियां ऋण भुगतान नहीं कर पा रहीं. गौरतलब है कि जब अमेरिका में आर्थिक संकट के बाद सारी दुनिया की बैंकिंग व्यवस्था चरमरा गयी थी, तब […]

।। डॉ अश्विनी महाजन।।

(एसोसिएट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय)

कुछ समय पहले रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने कहा था कि भारतीय बैंकिंग संकट में है, क्योंकि कुछ बड़ी कंपनियां ऋण भुगतान नहीं कर पा रहीं. गौरतलब है कि जब अमेरिका में आर्थिक संकट के बाद सारी दुनिया की बैंकिंग व्यवस्था चरमरा गयी थी, तब भारतीय बैंक मजबूती से खड़े थे. भारत के नीति-निर्माता इस बात को लेकर गर्व महसूस कर रहे थे कि भारत का बैंकिंग सिस्टम दुनिया से अलग है, सो वहां की उठा-पठक इसे प्रभावित नहीं करती.

लेकिन पिछले कुछ समय के घटनाचक्र देश में बैंकिंग व्यवस्था के लिए सिरदर्द बने हुए हैं. भारतीय बैंकों के लिए चिंता के दो मुख्य कारण हैं. पहला तो यह कि लगातार मंदी की मार ङोल रहे मैन्युफैरिंग एवं सेवा क्षेत्र अभी भी मुश्किल में हैं. ऐसे में कई कंपनियों और व्यक्तियों द्वारा ब्याज और ऋणों की अदायगी में कोताही हो सकती है, जिससे बैंकों की सेहत बिगड़ सकती है. फिलहाल ऐसे कोई संकेत नहीं हैं कि व्यापार और उद्योग की हालत में जल्द कोई सुधार होनेवाला है. महंगाई से घबराये रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में लगातार वृद्घि बिजनेस में सुधार की संभावनाओं पर विराम ही लगा रही है. राजन का कहना है कि बढ़ती महंगाई रिजर्व बैंक की ग्रोथ बढ़ाने की क्षमताओं को बाधित कर रही है.

लंबे समय से उधार की मांग न उठ पाने के कारण बैंकों को अपना काफी पैसा सरकारी बांडों में निवेश करना पड़ रहा है. सरकारी बांड खरीदने पर उसमें एक निश्चित ब्याज दर प्राप्त होती है. जब रिजर्व बैंक ब्याज दर बढ़ाता है, तो भी सरकारी बांडों पर पुरानी दर से ही ब्याज मिलता है. ऐसे में इन बांडों की वास्तविक कीमत कम हो जाती है, जिससे बैंकों को बेवजह नुकसान होता है.

बैंकिंग की सेहत ठीक नहीं, यह तो माना जा रहा है, लेकिन कई लोगों का कहना है कि रिजर्व बैंक के मापदंडों के चलते डरने का कोई कारण नहीं है. ध्यान रहे कि बैंकिंग पर संकट, बैंकों की बैलेंस शीट में छुपा होता है, जो बाहर से नजर नहीं आता. अमेरिका के बैंक और वित्तीय संस्थानों के डूबने से कुछ दिन पहले ही रेटिंग एजेंसियों द्वारा उन्हें अच्छी सेहत वाला बताया गया था. हाल ही में निजी क्षेत्र की रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने कहा है कि मार्च 2015 तक भारतीय बैंकों की 12 प्रतिशत परिसंपत्तियां दबावग्रस्त हो सकती हैं. फिच रेटिंग एजेंसी की एक शाखा इंडिया रेटिंग एंड रिसर्च का तो यह कहना है कि अगले दो वर्षो में भारतीय बैंकों के 14 प्रतिशत ऋण दबावग्रस्त हो जायेंगे.

इसका अर्थ यह है कि बैंकिंग क्षेत्र की हालत खराब हो सकती है. रिजर्व बैंक के हाल के आंकड़ों के अनुसार सितंबर, 2013 तक भारतीय बैंकिंग की एनपीए (गैर निष्पादक परिसंपत्तियां) 3.4 प्रतिशत तक पहुंच गयी, जबकि 2011 में यह 2.4 प्रतिशत ही थी. तेजी से बढ़ती एनपीए बैंकों की गिरती सेहत की तरफ संकेत कर रही है. यही नहीं, रिजर्व बैंक के अनुसार सितंबर 2014 तक एनपीए 4.2 प्रतिशत तक पहुंच सकती है. बैंकों को एनपीए के लिए प्रावधान बढ़ाने के लिए भी बारंबार निर्देश दिये जा रहे हैं. उसके अलावा, राजन का यह कहना कि कई कंपनियों द्वारा ऋण अदायगियों में कोताही की आशंका है, संकट की गंभीरता को रेखांकित करता है. बैंकिंग की सेहत केवल ऋण डूबने से ही नहीं, बल्कि उसके व्यवसाय से भी निर्धारित होती है. पिछले कई वर्षो से लगातार बढ़ती ब्याज दरों के कारण बैंकों से ऋणों का उठाव बहुत प्रभावित हुआ है. घरों, कारों और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के लिए ऋण की मांग तो घटी ही है, पूंजी निर्माण तो लगभग थम ही गया है. इनफ्रास्ट्रर में भी कोई हलचल नहीं है. अपने पास जमा धन को बैंक सरकारी प्रतिभूतियों में लगा रहे हैं. जाहिर तौर पर सरकारी बांडों में उधार की तुलना में कहीं कम ब्याज मिलता है, जिसका सीधा असर बैंकों के लाभ पर पड़ता है.

चिंता में डालनेवाली एक बात यह भी है कि 2004 के बाद बैंकों द्वारा भारी मात्र में ऋण दिये गये. ऋणों में होनेवाली वार्षिक वृद्घि, जीडीपी में होनेवाली वार्षिक वृद्घि से भी कहीं ज्यादा थी. वित्त सचिव राजीव टकरू ने कुछ समय पहले बैंकों के बार में यह कहा था कि बैंकों ने बिना छानबीन के जरूरत से ज्यादा ऋण बांटे. लेकिन बैंकों का कहना है कि उन्हें कई व्यावसायिक घरानों की ढांचागत परियोजनाओं के लिए ऋण देना उनकी मजबूरी थी. उन्हें कई ऐसी परियोजनाओं के लिए भी ऋण देना पड़ा, जिनका काम नीतिगत असमंजस के चलते आगे नहीं बढ़ पाया. जैसे, कोयला आधारित विद्युत परियोजनाओं के लिए ऋण दिये गये, लेकिन कोयले की अनुपलब्धता के कारण उनका काम शुरू नहीं हो सका.

कुछ जानकार मानते हैं कि इससे पहले कि बैंक ऋणों के डूबने से बीमार हो जायें, उन्हें सरकार से मदद मिलनी चाहिए. 2008 का वैश्विक अनुभव भी यही बताता है कि बैंकिंग क्षेत्र की दिक्कतें अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकती हैं. इसलिए समय रहते समाधान खोजना होगा.

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