कौन करे महिलाओं की चिंता!

महिला दिवस के अवसर पर मीडिया में महिलाओं का गुणगान एक रूटीन प्रक्रि या है. इस बात का उल्लेख किया जाता है कि महिलाएं अब पुरु षों के साथ कंधे से कंधा मिला कर कार्य कर रही हैं, घर की दहलीज से आगे बढ़ कर हर क्षेत्र में नाम रोशन कर रही हैं, आदि. इसी […]

महिला दिवस के अवसर पर मीडिया में महिलाओं का गुणगान एक रूटीन प्रक्रि या है. इस बात का उल्लेख किया जाता है कि महिलाएं अब पुरु षों के साथ कंधे से कंधा मिला कर कार्य कर रही हैं, घर की दहलीज से आगे बढ़ कर हर क्षेत्र में नाम रोशन कर रही हैं, आदि.

इसी के अंतर्गत कुछ नामी-गिरामी महिलाओं के फोटो और विचार भी दिखा कर इन बातों की पुष्टि की जाती है, लेकिन जरा ठहर कर सोचें कि क्या वाकई यही स्थिति है? क्या एक दिन महिलाओं के नाम कर देने से उन पर हो रहे जुल्म और हिंसा खत्म हो जायेंगे? क्या वहशी लोगों की मानसिकता में कोई बदलाव आ जायेगा? क्या सच में आज एक लड़के और एक लड़की की जिंदगी की चुनौतियां समान हैं. पहले विवाह संबंध के बारे मे सोचें. अक्सर बताया जाता है कि लड़कियों के विवाह की औसत उम्र बढ़ गयी है क्योंकि वे भी अपने पढ़ाई के बाद अपने करियर प्लान कर रही हैं.

अपने पैरों पर खड़े होने के बाद विवाह कर रही हैं. देखा जाये, तो अधिकांश लड़कियों के मामले में कारण अलग है. लड़कियों के साथ एक वस्तु की तरह व्यवहार होता है. उन्हें अपने आपको खूबसूरत और आकर्षक दिखाना पड़ता है. लड़की अगर सुंदर है, तो उसके लिए कई विवाह प्रस्ताव हैं, वरना तो कितनी ही बार अपमानित होना पड़ता है. कई लड़कियों के बाल विवाह हो जाने पर सपने चूर हो जाते हैं.

इस उपभोक्तावादी युग ने स्त्रियों को उपभोग की वस्तु बना कर रख दिया है. उनके खिलाफ अपराध तो बढ़ रहे हैं, लेकिन समाधान की कोई रोशनी नहीं दिखती. महिलाएं तो हर एक पल हमारे नाम कर देती हैं, लेकिन हम उन्हें सम्मान देने के लिए भी एक दिन निश्चय करते हैं, यह कहां का इंसाफ है? लेकिन इस समाज में इनकी चिंता करनेवाला कोई पैदा नहीं हुआ है. राजन सिंह, ई-मेल से

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