लोकतंत्र का विकृत चेहरा

शायद वो दिन बीत गये जब हमें विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का नागरिक होने पर नाज था. पिछले दिनों संसद में जो कुछ हुआ शायद वह मुंह पर कालिख पोतने के लिए काफी नहीं था, तभी तो चुनावी बिगुल बजते ही हस्तिनापुर में तथाकथित माननीय नेता और कार्यकर्तागण ऐसे भिड़े जैसे कुरुक्षेत्र में […]

शायद वो दिन बीत गये जब हमें विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का नागरिक होने पर नाज था. पिछले दिनों संसद में जो कुछ हुआ शायद वह मुंह पर कालिख पोतने के लिए काफी नहीं था, तभी तो चुनावी बिगुल बजते ही हस्तिनापुर में तथाकथित माननीय नेता और कार्यकर्तागण ऐसे भिड़े जैसे कुरुक्षेत्र में कौरव और पांडव.

पर यहां दोनों ओर कौरव ही थे और इस लड़ाई में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हार रहा था. इन पाखंडी नेताओं से भले तो हम आम इनसान हैं जो इतना धोखा खाने के बावजूद उफ्फ तक नहीं करते. इन्हें विकृत हो चुके लोकतंत्र ने लाइसेंस जो दे रखा है ताकि ये पार्टी, संगठन के नाम पर कुछ भी कर सकें . इन्हें रोकनेवाला तो कोई है नहीं. मीडिया भी एक-दो दिन हो-हल्ला करेगी लेकिन जैसे ही टीआरपी बढ़ानेवाली कोई अन्य खबर आयेगी, वह भी इस मुद्दे को भूल जायेगी.

हरीश चौरसिया, धनबाद

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >