आज सरकार में शामिल मंत्रियों का कद उनके विभागों, अनुभवों व काम से नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा में तैनात जवानों की संख्या से नापा जाने लगा है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने दो महीने पहले मंत्रियों की सुरक्षा की समीक्षा कर जवानों की संख्या घटाने का निर्देश दिया था. लेकिन, अभी तक सरकार किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी है. झारखंड के 11 मंत्रियों की सुरक्षा में 310 जवान लगे हुए हैं.
तय मानक से 90 ज्यादा. वह भी तब, जब हम होमगार्ड की जगह सिपाहियों की तैनाती को जायज मान लें. ये आंकड़े सामने हैं. इसके लिए किसी जांच आयोग की रिपोर्ट नहीं चाहिए. लेकिन शायद गंठबंधन सरकार की मजबूरियों का एक नतीजा यह भी है कि मुख्यमंत्री चाहते हुए भी अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों की सुरक्षा नहीं घटा पाते. मुख्यमंत्री कोई कठोर फैसला लें, तो उनकी सरकार खतरे में पड़ सकती है. सबसे अधिक सुरक्षा मुहैया करायी गयी है सहयोगी दल कांग्रेस के कद्दावर नेता राजेंद्र सिंह को, उसके बाद राजद की नेता अन्नपूर्णा देवी हैं.
हालांकि अधिक सुरक्षा पाने में मुख्यमंत्री के अपने दल झामुमो के मंत्री भी पीछे नहीं हैं. मुख्यमंत्री की राजनीतिक मजबूरी समझी जा सकती है. पर, इसकी आड़ में जनता के प्रति जवाबदेही से नहीं बचा जा सकता. जनता के पैसे को मंत्रियों की जरूरत से ज्यादा सुरक्षा पर खर्च करना, जनता के साथ अन्याय है. जान को खतरे का हवाला देते हुए मंत्रियों को तय मानकों से अधिक सुरक्षा मुहैया करा दी जाती है, लेकिन कभी इसकी समीक्षा नहीं की जाती. ना ही इस बात की समीक्षा होती है कि मंत्रियों को अतिरिक्त सुरक्षा कब और किन क्षेत्रों के लिए चाहिए.
ऐसे में मंत्रियों का काफिला लंबा होता जाता है और जनता पर बोझ बढ़ता जाता है. कई मंत्री तो परिवार को खतरा बता कर अपने परिजनों को भी सरकारी सुरक्षा मुहैया करा रहे हैं. ऐसा सिर्फ मंत्रियों के मामले में नहीं है. छोटे-मोटे हमले या धमकी मिलने का हवाला देकर बड़ी संख्या में नेता अपनी सुरक्षा में सरकारी गार्ड मुहैया करा ले रहे हैं. दूसरी तरफ, आम जनता जो बढ़ते अपराधों की शिकार है, जो सबसे ज्यादा असुरक्षित है, उसकी सुरक्षा के लिए पुलिस बल की कमी का रोना रोया जाता है. असुरक्षित जनता के सुरक्षित नेता, कैसी विडंबना है यह!
