बीते दिनों शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव ने नादिरशाही फरमान जारी कर सभी जिलों के संबंधित विभागाध्यक्षों को उन सारे शिक्षकों पर कारवाई करने का निर्देश दिया, जो अपने स्थानांतरण-पदस्थापन को लेकर सांसदों-जन प्रतिनिधियों से अनुशंसा या पैरवी कराते हैं. बकौल प्रधान सचिव, पैरवी-अनुशंसा विभाग की स्वच्छ परंपरा के प्रतिकूल है तथा इससे विभाग को स्वतंत्र निर्णय लेने में कठिनाई होती है.
लेकिन प्रधान सचिव को विदित हो कि यहां पूर्वी सिंहभूम जिले में उनके ही शिक्षा विभाग का पूरा ढांचा ध्वस्त है. पदाधिकारी निठल्लेपन के शिकार हैं, शिक्षकों के कार्यो और उनकी समस्याओं का निराकरण करना तो जैसे उन्हें आता ही नहीं. बदइंतजामी और बेपरवाही का क्या कहना! कोई गांव-देहात में है तो वह 18-20 वर्षो से वहीं पदस्थापित है, शहर के स्कूलों का दर्शन तक नहीं हुआ.
वहीं कई शिक्षक ऐसे हैं जो अपनी नियुक्ति तिथि से ही शहरों में जमे हैं. क्या यही है विभाग की स्वच्छ परंपरा और स्वतंत्र कार्य प्रणाली? क्या मुख्य सचिव जी यह पड़ताल करने की जहमत उठायेंगे कि बाहरी जिले के 60 शिक्षक किन परिस्थितियों में और क्यों 13 वर्षो से दुर्गम व नक्सलग्रस्त प्रखंड डुमरिया में ही पदस्थापित हैं? विभागीय नियमावली का कौन सा नियम उन्हें गांवों से निकल कर शहर के स्कूलों में आने नहीं देता.
विहंगावलोकन करें, तो लगता है कि राज्य में तबादलों की बाढ़ आयी हो, मगर इन सबके बीच एक तबका ऐसा भी है जो लंबे समय से गांवों में ही अपनी सेवा देता आ रहा है, जो आज भ्रष्ट और अनुत्तरदायी विभागीय प्राधिकार का बड़ा खमियाजा भुगत रहा है और चाह कर भी वह आज तबादलों से वंचित है. ऐसे में कोई अच्छी जगह पाने के लिए खुद से कोशिश कर रहा है तो किसी को परेशानी क्या है? रवींद्र पाठक, जमशेदपुर
