साढ़े चार करोड़ की आबादी का देश यूक्रेन पश्चिम और रूस के बीच चलनेवाली शक्ति-संतुलन की रस्साकशी में फंस गया है. यूक्रेन के मौजूदा संकट की शुरुआत बीते साल नवंबर महीने में हुई थी, जब रूस से अपने दोस्ताना संबंध बनाये रखने की टेक पर चलते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति यानुकोविच ने युरोपीय संघ के साथ दूरगामी प्रभाव वाले समझौते से इनकार कर दिया था.
राष्ट्रपति के इस फैसले के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आये. यूक्रेन के नागरिकों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जो यूरोपीय संघ में शामिल होना चाहते हैं. ऐसे नागरिक शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन करते हुए राजधानी कीव में जमा होते रहे और अंतत: जब विरोध-प्रदर्शन ने पुलिसिया कार्रवाई के बीच हिंसक रूप धारण किया, तो यानुकोविच को इस्तीफा देना पड़ा. अब हाल यह है कि यूक्रेन के रूसीभाषी लोगों के मानवाधिकार की रक्षा के नाम पर रूस ने यूक्रेनी शहर क्रीमिया में अपने सैनिक उतार दिये हैं. रूस ने वहां बड़ी संख्या में नौसैनिक युद्धपोत व युद्धक विमान भी सैन्य-अभ्यास के बहाने तैनात कर दिया है.
उधर पूरे मामले पर टेढ़ी नजर रखते हुए अमेरिका ने एक तो रूस के साथ अपने आर्थिक व सामरिक संबंधों को खत्म करने की धमकी देते हुए समूह-8 का सम्मेलन स्थगित कर दिया. उसने नाटो देशों और संयुक्त राष्ट्र की तरफ से भी दबाव बनाया कि रूस यूक्रेन की संप्रभुता का उलंघन करना बंद करे. अमेरिकी पहल का असर यह हुआ है कि रूस ने क्रीमिया में अपना सैन्य-अभ्यास बंद करने का ऐलान किया है. बहरहाल, यूक्रेन की जमीन पर मानवाधिकार की रक्षा बनाम संप्रभुता का उलंघन के नाम पर चलनेवाली इस हिंसक रस्साकशी का एक दूसरा पहलू भी है.
यह किसी मूल्य या आदर्श को बचाने के लिए नहीं, बल्कि वहां अपना प्रभाव बरकरार रखने के लिए चल रही खींचतान है. यूरोप अपनी कुल ईंधन-गैस खपत का 25 फीसदी से ज्यादा अभी रूस से आयात करता है और गैस-आपूर्ति की ज्यादातर पाइपलाइनें यूक्रेन से गुजरती हैं. यूरोपीय बाजारों के लिए यूक्रेन मक्का व गेहूं का बड़ा निर्यातक है. इसी कारण रूस और पश्चिमी देशों के बीच महत्वपूर्ण व्यापारिक कड़ी बने यूक्रेन की राजसत्ता पर दोनों पक्ष अपना नियंत्रण जमाये रखना चाहते हैं.
