पैदल से फरजी भयो, टेढ़ो-टेढ़ो जाय

।। चंचल।। (सामाजिक कार्यकर्ता) यह जो सियासत है न, अगर इसे मौजूदा, चलते-फिरते, हंसते-रोते, गाते-चीखते, सीना ताने, नाक रगड़ते इनसान के लिबास में इन मदरूदों को सामने रख कर देखा जाये, तो ये फटी हुई पनही से भी बदतर हालत में दिखेंगे. इसीलिए लोग शायद सियासत से चिढ़ते हैं. गो कि यह निहायत ही पाक-साफ […]

।। चंचल।।

(सामाजिक कार्यकर्ता)

यह जो सियासत है न, अगर इसे मौजूदा, चलते-फिरते, हंसते-रोते, गाते-चीखते, सीना ताने, नाक रगड़ते इनसान के लिबास में इन मदरूदों को सामने रख कर देखा जाये, तो ये फटी हुई पनही से भी बदतर हालत में दिखेंगे. इसीलिए लोग शायद सियासत से चिढ़ते हैं. गो कि यह निहायत ही पाक-साफ सलीका है जो जिंदगी को बेहतर बनाये रखने की गारंटी देता है.. बोलते-बोलते कयूम मियां चुप हो गये, क्योंकि हबीब की बकरी कम्बख्त एन वक्त पर कयूम के कपड़ों के साथ बदसलूकी करने लगी. चुनांचे! कयूम मियां सियासत से हट कर बकरी हांकने चले गये-‘का उमर के मौसी!’ बोल कर उसे एक डंडा मारा और वह मिमियाती हुई भागी. उमर को बहुत नागवार लगता है जब कयूम उसकी बकरी को उसकी मौसी भी कहें और सोटे से मारें. उमर मन मसोस कर रह जाता है और मन ही मन कयूम को गरिया लेता है.

तभी चुन्नी लाल ने बात आगे बढ़ाने की गरज से बोला- चच्चू जो बात सियासत की रही..? अबे चच्चू की औलाद! सियासत देखें कि लुंगी संभारें. ससुरी एन मुकाम पर काट गयी. अब जदि हम इसे पहन के निकलेंगे तो समझ लो सब कुछ जो गैर-वाजिब होता है वो तो ढंका रहेगा, लेकिन इज्जत खुले तौर पर सरेआम होगी. नवल उपाधिया ऐसे मौके खोजते रहते हैं- इज्जत ढंकना है काका? एक काम करो इस तहमत को उठाओ और इससे पपीते को लपेट दो, जो फूल के गुब्बारा हो रहा है.. कयूम ने नवल को गौर से देखा- तो पहनू क्या तुम्हारी.. सम्मी की बीवी खड़ी थी, मुस्कुरा कर तिरछी हो गयी. जोर का ठहाका लगा.

लेकिन नवल कब चुप रहनेवाले- सच्ची कहें कयूम काका? इन दिनों कमाल हो रहा है अब शरीर ढकने के लिए कपड़े की जरूरत नहीं रही. किसी को गुजरात भेजो औ एक पोस्टर मंगाय लो. बस उसे सामने चिपकाय लो. बस र्हे लगे न फिटकरी, रंग चोखा.’ कयूम मुस्कुराये, काहे कि किसी कागद में उन्होंने उस तस्वीर को देख रखा था- ऐसा? पता करो बेटा यह मर्दो के लिए भी है कि बस..? यह लो चिखुरी भी आ पहुंचे. उमर दरजी ने खटिया बिछा दी. एक-एक करके सब हाजिर. चाय उहां पियो यां हिंया, बस पीने से मतलब.

चुनाव होय वाला है. देखो का होता है. हम बिहार रहे बाबू जी! बड़ी उठा-पटक है. लाल्साहेब ने बकरी, सियासत और इज्जत के बीच बिहार को घुसेड़ दिया. लखन कहार खैनी मलते हुए चूना उठाया- उठा-पटक तो बताओ.. लाल्साहेब ताव खा गये- सुन लखन, एक बात कान खोल के सुन ले, ऊ ऊपी ना है, ना हरियाणा है, ऊ बिहार है. मुगल सराय से आगे जब गाड़ी बढ़ती है और बिहार में घुसती है, तो ससुरी सीटी भी राजनीति बोलने लगती है. पासवान, लालू, नीतीश, शिवानंद, जगदानंद सिंह, लालमुनी चौबे, रामबचन पांडे.. केतना नाम गिनाई सब क सब अखाड़े में हैं. कीन उपाधिया को तकलीफ हुई- और मोदी? लाल्साहेब बड़ी संजीदगी से बोले- न्ना, चरचे मत करो. बोहनी ना होई. कीन ने दूसरा सवाल किया- तो ये जो आपस में भिड़े पड़े हैं, इसका फायदा तो हम्मे मिलेगा? लाल्साहेब हत्थे से उखड़ गये-अथि मिलेगा.

एगो किस्सा सुन लो कीन. जब्बार दरजी का एक बाप रहा, लोग उसे खोदाई चचा कह कर गोहराते रहे. उस खोदाई की आदत रही भूलने की. कल बरात जानी है, एन वक्त पर पता चला कि बरात के मालिक का कुर्ता तो सिला ही नहीं है. बात है खेल्लन सिंह की. खेल्लन सिंह जब खोदाई के यहां पहुचे, तो क्या देखते हैं कि कपड़ा जस का तस वहीं धारा है. आव देखा न ताव, बस झट से खोदाई उठे और कैंची लेकर अपने बेटे जब्बार की तरफ लपके और लगे गरियाने, दूसरी तरफ जब्बार गज लेकर दौड़ा. अक्खा गांव जुट गया. लगा कि अब दो में से एक की जान तो गयी. लेकिन खेल्लन सिंह ने बीच बचाव किया और बोले- खोदाई भाय, भाड़ में जाय कुर्ता, हम बगैर कुर्ता के ही नाती क बियाह कर लेब, पर हमरी वजह से कतल मत कर. तो भइये, यह बिहार है, देखते रहो कौन किस्से लड़ रहा है, क्यों लड़ रहा है..

चिखुरी चुप-चाप सुन रहे थे, बोले- कयूम मियां! आप तो शतरंज के मजे खिलाड़ी हैं. इसमें सबसे कमजोर ‘पैदल’ होता है, लेकिन टहलते-टहलते जब वजीर के खाने में पहुंच जाता है, तो वजीर बन जाता है. पैदल से फर्जी भयो टेढ़ो-टेढ़ो जाय. सवाल किसी की जीत-हार का नहीं, इस बार खतरा दूसरा है. संसदीय व्यवस्था और जनतंत्र दांव पर लगा है. आज जैसी भाषा बोली जा रही है, निजी किस्से खुल रहे हैं, यह सब हमारे पतन की कहानी लिख रहे हैं. क्या कहेंगी आनेवाली पीढियां? दद्दा! एक बात बतायें, जदि ई चुनाव न रहा होता, तो का हम ऐसी तसवीर देख पाते? नवल को मालुम है कि कयूम मियां जवाब देंगे, इसलिए वह पहले से तैयार थे. नवल साइकिल लेकर चले. जाते-जाते फगुआ छोड़ गये- सदानंद रहै वहि द्वारे, मोहन खेलें होरी..

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