देश और राज्यों को सफलता के शिखर पर ले जाना राजनीतिज्ञों का एक महत्वपूर्ण दायित्व है. विगत दो-तीन दशकों में राजनीति में मूल्यों का हृास होते देखा जा रहा है. इसके गिरते हुए स्तर को ऊपर उठाना ही होगा. तमाम राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को इस ओर विचार करना ही होगा. यह देखा जा रहा है कि वर्षो से राजनीतिक दलों का झंडा ढोनेवाले हाशिये पर चले जाते हैं और इन दलों मे नये आनेवाले लोगों को चुनाव का टिकट दे दिया जाता है. इससे पुराने कार्यकर्ताओं में असंतोष व्याप्त हो जाता है. परिणामस्वरूप नये दलों का गठन हो जाता है.
चुनाव आयोग के अनुसार, देश में 2012 तक 1400 राजनीतिक दल हैं जो पंजीकृत हैं. इनमें से 85 प्रतिशत दलों ने किसी भी चुनाव में भाग नहीं लिया है. अगर राजनीति को भी रोजगार के एक नजरिये से देखा जाये, तो यहां पर न योग्यता का कोई पैमाना है और न ही प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था. जबकि रोजगार के विभिन्न साधनों यथा, सिविल सेवा, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, पुलिस, लिपिक आदि के लिए अलग-अलग पैमाने तय किये गये हैं. इनके लिए कुछ विशेष तरह के प्रशिक्षण भी दिये जाते हैं, यानी एक लोक सेवक के रूप में इन्हें नियमों-परिनियमों की जानकारी दी जाती है, तब कहीं जा कर इनसे उचित कार्य की अपेक्षा की जाती है.
ऐसा ही मापदंड और प्रशिक्षण देश को दिशा देनेवाले राजनीतिक दलों के नेतृत्वकर्ताओं को अपने दलों में लागू करना चाहिए. ऐसा करने से दलों में भाई-भतीजावाद का अंत होगा. उनमें मूल्यों की राजनीति करने की प्रेरणा जागेगी और राजनीति में एक स्वच्छ वातावरण बन सकेगा. ऐसे में देश को सही दिशा देनेवाले नेता मिल सकेंगे, जिससे देश का विकास होगा. संजय चंद, हजारीबाग
