असंगति और अहमन्यता का रास्ता

उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार कांग्रेस की नीति और आचरण में लगातार असंगति-विसंगति और तदर्थवाद दिखता रहा. नेतृत्व और उसके पसंदीदा लोगों ने कामकाज में जिस स्वेच्छाचारिता का प्रदर्शन किया, उसमें समाज और जनता के सरोकारों के लिए भला कहां जगह मिलती! जो लोग आज कांग्रेस के पराभव के लिए सिर्फ राहुल गांधी के कौशल-विहीन नेतृत्व को […]

उर्मिलेश

वरिष्ठ पत्रकार

कांग्रेस की नीति और आचरण में लगातार असंगति-विसंगति और तदर्थवाद दिखता रहा. नेतृत्व और उसके पसंदीदा लोगों ने कामकाज में जिस स्वेच्छाचारिता का प्रदर्शन किया, उसमें समाज और जनता के सरोकारों के लिए भला कहां जगह मिलती!

जो लोग आज कांग्रेस के पराभव के लिए सिर्फ राहुल गांधी के कौशल-विहीन नेतृत्व को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, शायद वे उनके प्रति न्याय नहीं कर रहे हैं और न ही देश की सबसे पुरानी पार्टी की समस्याओं का सही परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन कर पा रहे हैं. राहुल के कमान में आने से पहले ही कांग्रेस का पिचकना शुरू हो गया. बीते साढ़े नौ वर्षो के दौरान सत्ता में होने के बावजूद उसका कलेवर लगातार कृशकाय होता गया है. शुरुआत यूपीए-1 में ही हो गयी थी. तब पार्टी नेतृत्व को इस बात का एहसास नहीं हुआ कि वह शासन और सियासत को जिस रास्ते ले जा रहा है, उसके आखिर में सिर्फ खतरनाक खोह और गहरी खाइयां हैं.

इस बीच जिस कोर-ग्रुप में पार्टी और शासन के सारे महत्वपूर्ण फैसले लिये जाते रहे, उसमें कांग्रेस के सारे दिग्गज शामिल थे. उसमें राहुल गांधी या उनके नौसिखुए सलाहकार नहीं थे! उस आभिजात्य कांग्रेसी-क्लब के सदस्य राहुल तो अब बने हैं. परंपरा-निर्वाह करते हुए वह भी एक के बाद एक लगातार गलतियां कर रहे हैं.

कांग्रेस की असल समस्या असंगति और अहमन्यता पर टिकी उसकी राजनीतिक दृष्टि और वैचारिक सोच है. पिछली सदी के अंतिम दशक में ही यह बात साफ हो गयी कि अपने देश में एक-दलीय सत्ता-राजनीति का दौर अब खत्म हो चुका है. राजनीति में गठबंधन और समाज में समावेश व समायोजन का दौर कुछ लंबा चलेगा. पर इस विराट सच को कांग्रेस नेतृत्व ने कभी मंजूर नहीं किया. यूपीए-1 में वामपंथी दलों को अपमानित कर अपने राजनीतिक दायरे से बाहर करने के बाद कांग्रेस को गलती का एहसास नहीं हुआ. 2009 की चुनावी सफलता से कांग्रेस नेतृत्व ज्यादा अहमन्य हो गया. उसके नेताओं और मंत्रियों का आचरण ‘शहंशाह’ और ‘शहजादे’ जैसा रहा. सहयोगी-दलों, क्षेत्रीय नेताओं और अन्य सामाजिक-राजनीतिक घटकों की मानो कोई परवाह ही न हो. सरकार और संगठन के स्तर पर कांग्रेस ने अपने सहयोगियों को लगातार अवमूल्यित किया. यहां तक कि उसके कई अपने वरिष्ठ नेता भी इसकी लपेट में आये. नीतिगत फैसलों से लेकर राज्यपालों और शीर्ष नौकरशाहों की नियुक्तियों में भी इसकी झलक मिलती रही. इस मामले में भाजपा अपने सत्ता-काल में उसके मुकाबले ज्यादा व्यावहारिक दिखी. सच पूछिए तो कांग्रेस अपनी इसी अहमन्यता का आज खामियाजा भुगत रही है.

सैद्धांतिक स्तर पर भी कांग्रेस और यूपीए के नेतृत्व ने गठबंधन की राजनीति और सामाजिक समावेश की धारणा को लगातार अवमूल्यित किया और ठुकराया. अपने ‘युवराज’ को उसने इसी सोच के साथ राजनीतिक रूप से दीक्षित किया. ऐसे में राहुल अगर आज गठबंधन की राजनीति में अपने को ‘मिसफिट’ महसूस करते हैं, तो इसके लिए उन्हें दोषी ठहराना कहां का न्याय है! गंभीर माने जाने वाले डॉ मनमोहन सिंह ने भी अपने दोनों कार्यकालों के दौरान इस बात को बार-बार दोहराया कि ‘उनकी सरकार के सामने गंठबंधन की मजबूरियां हैं, जिनके चलते वह कई अपेक्षित फैसले नहीं ले पाती.’ क्या मजबूरी रही? सच यह है कि प्रधानमंत्री या कांग्रेस अध्यक्ष ने शायद ही किसी बड़े राजनीतिक-आर्थिक मुद्दे पर अपने किसी गठबंधन-सहयोगी के दबाव में आकर कोई समझौता किया या अपनी इच्छा के विपरीत काम किया. क्या प्रधानमंत्री ने न्यूक्लियर-सौदे पर वामपंथियों के दबाव में आकर अपना एजेंडा या विचार बदला? क्या बाहर से समर्थन दे रहे सपा-बसपा के दबाव के बावजूद उन्होंने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के अपने विचार को पलटा? राष्ट्रमंडल खेलों में ठेकों का मामला हो, संचार मंत्रलय से संबद्ध स्पेक्ट्रम आवंटन की नीति हो, हेलीकॉप्टर-खरीद का सौदा हो या कोलगेट मामले के फैसले हों, सरकार ने कब और किसके दबाव में काम किया या अपनी इच्छा का कोई फैसला बदला?

कांग्रेस की नीति और आचरण में लगातार असंगति-विसंगति और तदर्थवाद दिखता रहा. नेतृत्व और उसके पसंदीदा लोगों ने कामकाज में जिस स्वेच्छाचारिता का प्रदर्शन किया, उसमें समाज और जनता के सरोकारों के लिए भला कहां जगह मिलती! इसका उदाहरण दिल्ली में कदम-कदम पर मिलता रहा. दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने हाल ही में कहा, ‘मुङो इस बात का अंदाजा नहीं था कि लोग हमसे इतना नाराज हैं और आम आदमी पार्टी को 28 सीटें देने वाले हैं.’ लेकिन विडंबना देखिए, अब यही कांग्रेस आंध्र में ‘दिल्ली की कहानी’ दोहराने जा रही है. कांग्रेस चाहती तो राज्य के बंटवारे के लिए ज्यादा पारदर्शी और लोकतांत्रिक तरीका अपना सकती थी. इससे सांगठनिक-फूट से भी वह बच जाती. पर तेलंगाना के सवाल पर वह लगातार अपनी समस्याएं बढ़ाती रही. इसकी शुरुआत तब हुई, जब जगनमोहन रेड्डी ने अपने पिता के निधन के कुछ समय बाद नयी पार्टी बना ली. क्या वाइएसआर राजशेखर रेड्डी के कार्यकाल में जगन का सारा व्यापार पाक-साफ था? तब सीबीआइ कहां थी? पूरे दो-तीन साल कांग्रेस एक तरफ जगन को निपटाने में और दूसरी तरफ टीआरएस सुप्रीमो चंद्रशेखर राव को फुसलाने में लगी रही. अगर उसने ईमानदारी से काम किया होता तो तेलंगाना-सीमांध्र विभाजन इतना तीखा न होता.

अब सीमांध्र को विशेष पैकेज दिया जा रहा है, लेकिन बिहार-झारखंड की तरफ से लगातार मांग के बावजूद दोनों सूबों को कभी तवज्जो नहीं दी गयी. दोनों सूबे असमान विकास और क्षेत्रीय विषमता से ग्रस्त रहे हैं. लेकिन कांग्रेस नेतृत्व सामाजिक-आर्थिक समावेशी सोच और समायोजन के बजाय राजनीतिक तिकड़म को महत्व देता आया है. इस तरह अपना राजनीतिक-सत्यानाश तो उसने स्वयं किया है, उसके लिए किसी गठबंधन-सहयोगी को कसूरवार नहीं ठहराया जा सकता. कुल मिला कर कांग्रेस या सरकार के हाल के किसी भी बड़े कदम से कोई भी खुश नहीं. अभी केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जाटों को ओबीसी श्रेणी में रख कर आरक्षण देने का फैसला किया. पश्चिम उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थानों में जाटों के भाजपा की ओर जाने के दबाव के चलते यह फैसला हुआ. जब-जब कांग्रेस ने आरक्षण को मंजूर किया, मजबूरी में किया. पिछले दिनों उसके एक शीर्ष नेता ने आरक्षण की पूरी व्यवस्था को ही खत्म करने का सुझाव दिया था. इसका तीखा विरोध हुआ. अब उसी कांग्रेस ने पश्चिम भारत की सामाजिक-शैक्षिक रूप से समृद्ध जाति को आरक्षण देना मंजूर कर लिया. यह राजनीतिक तिकड़म की संकीर्ण सियासत नहीं तो और क्या है? ऐसे में सोनिया-राहुल की पिचकती कांग्रेस को और कृशकाय होने से भला कौन बचा सकता है!

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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