पिछले तीन दिनों में दो बार ऐसा हुआ कि मनमोहन सिंह कैबिनेट को अध्यादेशों के जरिये भ्रष्टाचार-विरोधी कानून बनाने के अपने इरादे को छोड़ना पड़ा. रिपोर्टो को मानें तो राहुल गांधी की तीव्र इच्छा थी कि भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए जो विधेयक संसद के सामने नहीं रखे जा सके, उन्हें अध्यादेश जारी कर कानून का रूप दे दिया जाये. लेकिन, सरकार के इस रवैये से कई दलों की सहमति नहीं थी, जिसमें कुछ सहयोगी भी शामिल थे.
विरोधियों की राय में चुनाव से पहले सत्ताधारी दल को राजनीतिक फायदा पहुंचाने के लिए लोकलुभावन अध्यादेश लाना अलोकतांत्रिक कदम है. यह तर्क बिलकुल सही है. इस हफ्ते लोकसभा चुनावों की घोषणा की संभावना है, जिसके बाद आचार-संहिता लागू हो जायेगी. भ्रष्टाचार बड़ी समस्या है, जिस पर नियंत्रण के लिए कानूनों की जरूरत है, पर ऐसे कानून बिना व्यापक चरचा के नहीं बनने चाहिए. हालांकि बहुत जरूरी होने पर अध्यादेश लाये जा सकते हैं, लेकिन इतने सारे विधेयकों को एक जाती हुई सरकार द्वारा कानून में तब्दील करने की कोशिश उचित नहीं मानी जा सकती.
रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति ने वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों को कुछ महत्वपूर्ण तकनीकी बिंदुओं के आधार पर भी अध्यादेश नहीं लाने का सुझाव दिया. 15वीं लोकसभा अभी अस्तित्व में है, जबकि इन अध्यादेशों को कानून बनाने की जिम्मेवारी अगली सरकार व लोकसभा की होगी. राष्ट्रपति को यह स्थिति ठीक नहीं लगी. इन आपत्तियों की पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री ने वरिष्ठ मंत्रियों व कांग्रेस नेताओं के साथ बैठक कर अध्यादेशों को नहीं लाने का निर्णय लिया. सरकार को यह भी भय था कि कहीं राष्ट्रपति इन अध्यादेशों को अपने पास लंबित न रख लें.
यह स्थिति सरकार और कांग्रेस के लिए बहुत उलझन भरी होती. दुर्भाग्यपूर्ण है कि वर्तमान लोकसभा संसद के इतिहास की सबसे कम काम करनेवाली लोकसभा रही. ऐसा नहीं होता तो शायद इन विधेयकों का निपटारा हो गया होता. लेकिन इसके लिए काफी हद तक जिम्मेवार सरकार व पार्टी अध्यादेश की राह अपनाने की हड़बड़ी दिखायें, यह भी उचित नहीं है. बहरहाल, अच्छा हुआ कि समय रहते सरकार चेत गयी. लेकिन, यह प्रकरण हमारी लोकतांत्रिक चेतना और क्षमता को भी चेता गया.
