धनबाद के मंडल जेल में एक आपराधिक गैंग से जुड़े कैदियों ने जेलर पर हमला बोल कर उनके कंधे की हड्डी तोड़ दी. आम आदमी जहां जेल के नाम से ही डरता है, वहीं ऐसे लोग भी हैं जिनके लिए जेल एक अभयारण्य है. जेल में उनके लिए हर सुविधा है. अलग से खाने-पीने का इंतजाम. अपने घर-परिवार, संगी-साथियों से जब चाहे मिलने की आजादी. हाथ-पैर दबाने के लिए सेवक, वगैरह वगैरह. ये सेवक कोई और नहीं, कमजोर तबके से आनेवाले कैदी होते हैं.
वहीं जिनके लिए जेल अभयारण्य है, वे वो लोग हैं जिनके पास धनबल है, बाहुबल है, राजनीति से लेकर धर्म की सत्ता है. यानी, जिन लोगों की जेल के बाहर चलती है, उनकी जेल के अंदर भी चलती है. झारखंड हो या बिहार, या फिर कोई अन्य प्रदेश, जब भी जेलों में छापामारी होती है, मोबाइल फोन, धारदार हथियार, सिगरेट, शराब की बोतलें आदि बरामद होने की खबरें आती रहती हैं. जेल में ऐश-मौज का हर सामान हाजिर है, बस आपकी जेब में पैसा होना चाहिए. अक्सर जेल के कर्मचारी ही सप्लाई एजेंट के रूप में काम करते हैं. मोटी रकम के बदले वे निषिद्ध सामान खुद पहुंचवाते हैं. जैसे जेल के बाहर ‘कैश है तो ऐश है’ वाला फारमूला चलता है, वैसे ही यह जेल के अंदर भी चलता है.
जैसे जेल के बाहर सत्ता से जुड़े लोगों को सरकारी कारिंदे सलाम बजाते हैं, वैसे ही जेल के अंदर भी. कुल मिला कर कहें तो जेल हमारे तंत्र का प्रतिबिंब है. जैसा हमारा समाज, हमारा लोकतंत्र वैसा ही जेल में भी सिस्टम. अमीरों के प्रति शासन-प्रशासन, पुलिस, अदालत का नजरिया अलग होता है और गरीबों के प्रति अलग. गरीब आदमी इलाज के अभाव में जेल के बाहर भी मरता है और जेल के भीतर भी. वीआइपी कैदी जरा-सी तबीयत नासाज होने पर, हवा-पानी बदलने के लिए जेल से निकल बड़े-बड़े अस्पतालों के कॉटेज में महीनों के लिए शिफ्ट हो जाते हैं. मौत की तरह बढ़ रहे अपने किसी परिजन के अंतिम दर्शन के लिए भी आम आदमी को पैरोल हासिल करना मुश्किल होता है, पर संजय दत्त जैसे कैदी महीनों लंबी पैरोल पा जाते हैं. भारत में आज भी जेल, जेल उसी के लिए है जो गरीब है, कमजोर है, साधनविहीन है. जिनके पास धन है, सत्ता है, उनके लिए तो जेलर भी चाकर ही है.
