देश की राजनीति में इन दिनों नेताओं की बदजुबानी का चलन बढ़ता जा रहा है. अक्सर चुनावों के नजदीक होने पर भीड़ भरी सभा से अपने समर्थन में तालियां बजवाने के लिए नेता सस्ती जुबान पर उतर आते हैं. अब आजकल के स्वयंसिद्ध नेताओं के पास अटल जी व मधु लिमये जी जैसी शैली और वक्तृत्व कला थोड़े ही है, जो लाखों की भीड़ को थाम कर सुना सकें! भारत सरकार के दायित्ववान पद पर बैठे सलमान खुर्शीद ने नरेंद्र मोदी को ‘नपुंसक’ कहा वहीं, एक बार भाजपा के नेता जसवंत सिंह ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ‘शिखंडी’ कह कर आलोचना की.
इससे निचले स्तर के नेताओं की बदजुबानी को तो लिखा भी नहीं जा सकता, हो सकता है कि शर्म को भी शर्म आ जाये. पर क्या करें, इन्हीं बोलों से सियासतदानों को त्वरित तालियां बटोरनी आती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में उस जनहित याचिका को स्वीकार कर लिया, जिसमें चुनाव से पूर्व नामांकन में प्रचार के दौरान बदजुबानी और झूठे बयान न देने के बाबत वचन देना जरूरी होगा. चुनाव प्रचार के दौरान नेताओं की फिसलती जुबान और अन्य प्रत्याशियों पर निजी टिप्पणियों या अशोभनीय बयानों को रोकने के मकसद से यह याचिका दायर की गयी है. इस याचिका पर सुनवाई होनी है. भारतीय राजनीति में नेता एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने और अशोभनीय टीका-टिप्पणी करने का काम करते आये हैं, जिसे लेकर भारतीय राजनीति विश्व स्तर पर शर्मसार होती रही है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा जनहित याचिका को स्वीकार करने के बाद उम्मीद की जा सकती है कि नेताओं की बदजुबानी पर रोक लग सकेगी. फिलहाल तो इनके करतबों पर इरशाद कामिल का लिखा गाना, ‘जो भी मैं कहना चाहूं, बर्बाद करें अल्फाज मेरे’, सटीक बैठता है.
नीरज चौधरी, ई-मेल से
