बिहार लंबे समय से विशेष दरजे की मांग करता रहा है. केंद्र को अपनी इस मांग का आधार भी बताता रहा है. तमाम दलीलें दे चुका है, दुहरा चुका है. बिहार से ही अलग हो कर करीब 13 वर्ष पहले अस्तित्व में आये झारखंड के लोगों की मांग भी यही है. उन्हें भी झारखंड के लिए विशेष राज्य का दरजा चाहिए. बिहार के मामले में तो यह मांग और भी पुरानी है.
सबको पता है कि इस मांग पर अंतिम फैसला केंद्र सरकार को करना है. पर, वह चुप है. केंद्रीय स्तर के कुछ नेताओं के यदा-कदा आ रहे बयानों और रघुराम राजन कमेटी के गठन जैसी पहलकदमियों को इन राज्यों की जनता का एक बड़ा वर्ग महज राजनीतिक स्टंट मानता है. आम धारणा यह है कि ऐसा कर केंद्र सरकार विशेष राज्य के दरजे की अहम मांग को लटकाये रखना चाहती है, टालते रहना चाहती है. अगर ऐसा नहीं है, तो सीमांध्र के मामले में जिस तेजी से केंद्र ने फैसला लिया, वह तेजी बिहार-झारखंड के लिए भी दिखायी जा सकती थी.
पर, साफ लग रहा है कि इन राज्यों की आवाज को दिल्ली अनसुना करने की कोशिश कर रही है. वर्षो से इस कोशिश में वह सफल भी है. कम से कम अब तक तो जरूर. इस बीच, संयोगवश इसी मांग के मद्देनजर दो मार्च को दोनों ही राज्यों में बंद रखा गया. बिहार के मुख्यमंत्री पटना में धरने पर भी बैठ चुके हैं. पैदल मार्च कर चुके हैं. उधर, झारखंड के पूर्व उप मुख्यमंत्री बंद में सक्रिय रूप से सड़क पर उतर कर गिरफ्तारी दे चुके हैं. इससे स्पष्ट है कि अब यह मांग और जोर पकड़नेवाली है. बिहार के बाद झारखंड में भी. बिहार के मुख्यमंत्री बार-बार दुहरा चुके हैं कि जब तक बिहार को विशेष राज्य का दरजा नहीं मिल जाता है, चुप बैठने का सवाल ही नहीं उठता.
इसके साथ ही, बंद के दौरान दोनों राज्यों की जनता ने जिस तरह शांति और संयम से एकजुटता दिखायी है, उससे स्पष्ट लग रहा है कि अब यह मांग आमलोगों की भावनाओं से जुड़ चुकी है. केंद्र में बैठी सरकार को बंद के आईने में बंद करने-करानेवालों की भावनाएं समझने की कोशिश करनी चाहिए. उसके अनुरूप जरूरी कदम भी उठाने चाहिए. जल्द से जल्द. केंद्र सरकार को समझना होगा कि विशेष राज्य के दरजे से बिहार और झारखंड को जो लाभ होगा, उससे पूरा देश लाभान्वित होगा.
