।।एम जे अकबर।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
अमेरिकी चैनल एनबीसी की 28 फरवरी की सुबह की बुलेटिन के बीच एक समाचार ऐसे दिखाया गया, मानो संपादक इसे लेकर सशंकित हो. खबर थी कि एक मृत व्यक्ति जीवित हो उठा था. एनबीसी जैसा बड़ा चैनल बिना जांच किये ‘मृत’ और बिना पुष्टि किये ‘जीवित’ का प्रयोग नहीं करता. शोक-संतप्त परिजन मुर्दे को दफनाने जा रहे थे कि वह ताबूत में पैर चलाने लगा. समाचार पढ़नेवाले वैसे ही आश्चर्यचकित थे, जैसे परिजन हुए होंगे. इसे एक चमत्कार बताते हुए तुरंत मौसम की जानकारी वाले हिस्से में चले गये. ऐसी शर्मिदगी से किसी चमत्कार का कभी अभिवादन नहीं किया गया है. इस कहानी में एक सीख है. जब तक शरीर दफन नहीं हो जाता, तब तक उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए. भारत और अमेरिका के संबंध बेहोशी की हालत में हैं, लेकिन, कब्रिस्तान अभी बहुत दूर है. अमेरिकी शिक्षण संस्थाओं और मीडिया की एक छोटी, पर मजबूत लॉबी, जो भारत-संबंधी नीतियों को भले न प्रभावित कर सके, परंतु नजरिये को जरूर प्रभावित किया है, ने अंतत: यह स्वीकार करना शुरू कर दिया है कि नरेंद्र मोदी के दिल्ली-अभियान को बाधित नहीं किया जा सकता है. इस लॉबी की एक उपलब्धि यह थी कि इसने मोदी को वीजा नहीं मिलने दिया. हालांकि इसने कभी सोनिया गांधी के वीजा पर सवाल नहीं उठाया, जिन पर एक अमेरिकी अदालत ने 1984 के दंगों में कथित भूमिका के लिए दोष आरोपित किया है.
अमेरिकी संस्था पीइडब्ल्यू के ओपिनियन पोल ने एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करते हुए कांग्रेस के 19 प्रतिशत के मुकाबले मोदी को 63 प्रतिशत का अभूतपूर्व समर्थन दिखाया है. वाशिंगटन पीइडब्ल्यू की ईमानदारी पर भरोसा करता है. भारतीय चुनावी परिदृश्य की छोटी पार्टियों के बढ़ते झुकाव के संकेत भी हैं, जो खुद बहुत कुछ हासिल नहीं कर सकते, लेकिन उनके वोटों का हिस्सा मुख्य दलों के ताकतों के साथ जुड़ कर जीत दिला सकते हैं. 2004 और 2009 में वे आमतौर पर कांग्रेस और यूपीए के साथ थे. इस साल गुरुत्वाकर्षण का खिंचाव दूसरी दिशा में है. दो महीने से बिहार में लालू यादव-राम विलास पासवान-कांग्रेस की तिकड़ी के पुनरुद्धार की चर्चा है. लेकिन आखिरी समय में भाजपा ने दोनों दलों का निर्णायक गंठबंधन बना लिया.
वाशिंगटन को भी अब सुध आयी है और उसने केसरिया गंध को महसूस करना शुरू कर दिया है. यह कोई राज की बात नहीं है कि राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत में रुचि अब पहले की तरह नहीं रही. उनकी एशियाई प्राथमिकताएं अब भारतीय सरहद के पूर्व और पश्चिम में हैं. अमेरिकी अर्थव्यवस्था में चीन के महत्व के कारण वे चीन से रिश्तों पर बहुत ध्यान दे रहे हैं. भारत आर्थिक रूप से कुछ भी देने की स्थिति में नहीं है. ओबामा अफगानिस्तान से हटने के निर्णय पर बरकरार हैं, जिसके लिए उन्हें पकिस्तान का सहयोग जरूरी है. वहां से अमेरिका के जाने के बाद भारत की बड़ी भूमिका की संभावना है, लेकिन यह भविष्य की बात है.
ओबामा की सबसे महत्वपूर्ण पहल ईरान के साथ संबंध सुधारने की विशेष कोशिश है. उन्हें पता है कि तात्कालिक और नाटकीय भू-राजनीतिक असरों के अलावा इस पहल को इतिहास में जगह मिलेगी. भारत इसमें उल्लेखनीय सहायक हो सकता था, लेकिन इसके लिए भरोसे की जरूरत थी, जो बची नहीं थी. भारत के साथ परमाणु करार को असलियत का जामा पहनानेवाले अमेरीकी नौकरशाहों और राजनेताओं का एक शक्तिशाली समूह विश्वासघात की बात प्रचारित कर रहा है. उनके हिसाब से भारत ने करार के अलिखित समझौतों का पालन नहीं किया है. रक्षा मंत्री एंटनी से अधिक किसी ने भारत-अमेरिकी संबंधों को नुकसान नहीं पहुंचाया है, जिन्होंने भारत को लड़ाकू जहाज बेचने के अमेरिकी प्रयासों को शुरू में ही निरस्त कर दिया. इस पर वाम झुकाव वाले केरल के एक अन्य नेता कृष्ण मेनन की याद आती है. अगर एंटनी के पास इसके पक्ष में कोई दलील है, तो उन्होंने और उनके दूतों ने इसे ठीक से स्पष्ट नहीं किया है.
देवयानी खोबरागड़े का अजीब-सा मसला छोटा मामला था, जो दिल्ली और वाशिंगटन की सत्ताओं द्वारा युद्धक्षेत्र बनाने से बड़ा बन गया. ऐसा अन्य कारणों से पैदा हुए विद्वेष का परिणाम था. पांच साल पहले ऐसे मसले आसानी से निपटा दिये जाते. भारत-अमेरिका संबंध इतने खराब नहीं हुए हैं कि उन्हें ठीक नहीं किया जा सकता है, लेकिन वे खतरनाक अव्यवस्था के स्तर पर पहुंच चुके हैं. उन पर खुल कर बात होनी चाहिए, उनका उस पारदर्शिता के साथ निपटारा होना चाहिए, जो अच्छे मित्रों के बीच होती है. दोनों देशों के बीच मौजूदा तल्खी बेमतलब और गैरजरूरी है. दोनों गंभीर तनाव के मुद्दों पर महत्वपूर्ण सहयोगी हो सकते हैं और जो मूलभूत मूल्यों और सरोकारों के साझीदार हैं. ऐसी खीझ अपरिपक्वता है.
ऐसा नहीं कि बेहतरी के लिए कोई चमत्कार जरूरी है. ओबामा का कार्यकाल अभी दो साल बाकी है तथा पीइडब्ल्यू के अनुमानों के मुताबिक मई में दिल्ली में भी सरकार बदलेगी. बदलाव एक अवसर है. हाल के दिनों को पीछे छोड़ देना ही ठीक है. दिल्ली-वाशिंगटन को नयी पहल करने की जरूरत है, जो उस गतिशीलता में फिर से जान डाल सके, जिसका कभी वादा किया गया था, पर जिसे अभी भटका दिया गया है.
