बड़ी कूटनीतिक कामयाबी

हम किसी दुश्मन से तीन तरीके से निबटते हैं. पहला तरीका आत्मरक्षा का है, यानी पहरेदारी पर डटे रहो और कोई हमलावर हो तो उसका मुकाबला करो. दूसरा तरीका है आत्मरक्षा के ख्याल से खतरे की आशंका को भांपना और इससे पहले कि खतरा सिर पर सवार हो जाये, खतरा पहुंचानेवाले को इतना कमजोर कर […]

हम किसी दुश्मन से तीन तरीके से निबटते हैं. पहला तरीका आत्मरक्षा का है, यानी पहरेदारी पर डटे रहो और कोई हमलावर हो तो उसका मुकाबला करो. दूसरा तरीका है आत्मरक्षा के ख्याल से खतरे की आशंका को भांपना और इससे पहले कि खतरा सिर पर सवार हो जाये, खतरा पहुंचानेवाले को इतना कमजोर कर देना कि वह चोट पहुंचाने का विचार मन में लाने से पहले सौ दफा सोचे.
तीसरे तरीके में दुश्मन को सीधे चोट पहुंचाने की मंशा महत्वपूर्ण होती है और इसके लिए दुश्मन पर सीधे-सीधे वार किया जाता है. भारत को दुश्मन मान कर उसे अधिकतम चोट पहुंचाने की नीयत से पाकिस्तान ने अक्सर इस तीसरे तरीके को अपनाया है, जबकि भारत ने आत्मरक्षा वाले पहले तरीके को.
आत्मरक्षात्मक तरीका अपनाने में दिक्कत यह है कि यदि कोई आपकी तरफ सौ पत्थर फेंकेगा, तो पूरी मुस्तैदी दिखाने के बावजूद आप हद-से-हद 90 पत्थरों की चोट से ही खुद को बचा सकेंगे, 10 पत्थरों की चोट आपको किसी-न-किसी रूप में लगेगी ही. पाकिस्तान की हमलावर रणनीति के सामने भारत की स्थिति ऐसी ही है. इसलिए आज भारत की जरूरत दुश्मन से निबटने के दूसरे तरीके यानी आत्मरक्षा के विचार से प्रेरित होकर हमलावर को कमजोर करने की है. इस दूसरे तरीके में आप दुश्मन की कमजोरियों को केंद्र में रखकर अपनी रणनीति तय करते हैं.
ये कमजोरियां आर्थिक मोर्चे की हो सकती हैं, आंतरिक सुरक्षा से संबंधित हो सकती हैं या फिर आतंकवाद को प्रश्रय देने के कारण अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विश्व-बिरादरी के बीच अलग-थलग कर देने की हो सकती हैं. प्रधानमंत्री के सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने यह बात तंजावुर (तमिलनाडु) के एक विश्वविद्यालय में छात्रों के बीच देश की सुरक्षा से संबंधित अपने एक व्याख्यान में कही थी. उड़ी में पाकिस्तान प्रेरित आतंकी हमले का दंश झेलने के बाद पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए भारत ने जो रणनीति अपनायी है, उसमें डोभाल के तंजावुर वाले व्याख्यान की झलक साफ देखी जा सकती है.
तो भारत अब आत्मरक्षा के लिए दूसरी रणनीति पर चल रहा है. इसी कारण विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संयुक्त राष्ट्र में पहली बार बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के हनन का मसला उठाया. पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से बलूचिस्तान उसकी एक कमजोर नस है.
इसके बाद भारत ने इसलामाबाद में नवंबर में प्रस्तावित सार्क देशों के शिखर सम्मेलन में भाग नहीं लेने का फैसला किया. इस फैसले को जिस तरह से कुछ साथी देशों का समर्थन मिला है, वह आतंकवाद के मसले पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने की भारत की कूटनीति की बड़ी कामयाबी है. भारत के फैसले के बाद बांग्लादेश, भूटान और अफगानिस्तान ने हालांकि अलग-अलग कारणों से सार्क शिखर सम्मेलन में भाग नहीं लेने का फैसला किया है, लेकिन इन देशों ने पाकिस्तान पर कमोबेश वही आरोप लगाये हैं, जो भारत कहता रहा है.
जहां बांग्लादेश ने कहा है कि हमारे आंतरिक मामले में एक देश अपना हस्तक्षेप लगातार बढ़ा रहा है और ऐसा माहौल सार्क देशों के सम्मेलन में हमारी शिरकत के अनुकूल नहीं है, वहीं अफगानिस्तान ने स्पष्ट शब्दों में ऐतराज जाहिर करते हुए कहा है कि हमारे ऊपर आतंकवाद को लगातार थोपा जा रहा है और इससे निबटने की जरूरत हमें सार्क देशों के सम्मेलन में भाग लेने से रोक रही है. भूटान का स्वर भी ऐसा ही है. उसने कहा है कि दक्षिण एशियाई क्षेत्र में बढ़ता तनाव का माहौल सार्क देशों के सम्मेलन के अनुकूल नहीं है.
बेशक कुछ लोगों को लग सकता है कि सार्क देशों के सम्मेलन में भागीदारी से इनकार दक्षिण एशियाई क्षेत्र में आर्थिक-सांस्कृतिक सहयोग और संवाद के एक संभावनाशील मंच को चोट पहुंचाने जैसा है, लेकिन इस आशंका में खास दम नहीं है. भारत सार्क के साथ-साथ एक और क्षेत्रीय संगठन बिमिस्टेक का सदस्य है.
बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी सेक्टोरल टेक्निकल एंड इकोनॉमिक कोऑपरेशन (बिमिस्टेक) भी सार्क के ही समान इलाके के देशों में आपसी सहयोग बढ़ाने की मंशा से बना है. सार्क के कई सदस्य देश बिमिस्टेक के भी सदस्य हैं, जैसे नेपाल, श्रीलंका भूटान और बांग्लादेश, जबकि पाकिस्तान क्षेत्रीय सहयोग के इस मंच में नहीं है.
फिलहाल पाकिस्तान की कोशिश सार्क देशों के बीच किसी-न-किसी तरह चीन को भी शामिल करने की है और इसी नीयत से वह सार्क देशों के बीच ऊर्जा और आर्थिक लक्ष्यों से जुड़ी किसी भी आपसी पहल को साकार नहीं होने देना चाहता है. चूंकि पाकिस्तान बिमिस्टेक का सदस्य नहीं है, इसलिए भारत और उसके सहयोगी देशों के लिए सार्क से अपेक्षित लक्ष्यों को बिमिस्टेक के जरिये साधना अब ज्यादा सहज हो सकता है.
सार्क के समानांतर बिमिस्टेक को मजबूत बनाने के मकसद से ही भारत ने इसके सदस्य देशों को गोवा में होनेवाले ब्रिक्स सम्मेलन में शिरकत करने का न्योता दिया है. कुल मिलाकर आगाज अच्छा है और यदि यह पहल आगे सफल होती है, तो पाकिस्तान को अलग-थलग रखते हुए दक्षिण एशिया में आर्थिक सहयोग का ताना-बाना तैयार करने के भारत के प्रयास निश्चित ही फलीभूत होंगे.

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