राजधानी भी सुरक्षित नहीं

दिल्ली में जघन्यतम निर्भया कांड के बाद ‘वी वांट जस्टिस’ नारे के साथ महिलाओं की सुरक्षा को लेकर देशभर से उठी मांग की तसवीरें आज भी हर किसी के जेहन में ताजा हैं. इस घटना के बाद भारत की राजधानी को ‘रेप कैपिटल’ के नाम से भी पुकारा गया था. फरवरी, 2015 में दिल्ली विधानसभा […]

दिल्ली में जघन्यतम निर्भया कांड के बाद ‘वी वांट जस्टिस’ नारे के साथ महिलाओं की सुरक्षा को लेकर देशभर से उठी मांग की तसवीरें आज भी हर किसी के जेहन में ताजा हैं.

इस घटना के बाद भारत की राजधानी को ‘रेप कैपिटल’ के नाम से भी पुकारा गया था. फरवरी, 2015 में दिल्ली विधानसभा चुनाव जिन बड़े मुद्दों पर लड़ा गया, उसमें महिलाओं की सुरक्षा के लिए किये जानेवाले इंतजाम का सवाल भी प्रमुखता से शामिल था. लेकिन, हासिल क्या हुआ? नेशनल क्राइम रिकाॅर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़े संकेत करते हैं कि महिलाओं की सुरक्षा के इंतजाम करने में राजधानी दिल्ली की हालत देश के अन्य बड़े शहरों या केंद्रशासित प्रदेशों से बेहतर नहीं है.

2014 में दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 15,265 मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2015 में यह संख्या बढ़ कर 17,104 हो गयी. इस वृद्धि को राजधानी में होनेवाले शेष आपराधिक वारदातों में वृद्धि के साथ देखने से तसवीर और भयावह नजर आती है. दस लाख से ज्यादा आबादीवाले देश के 53 बड़े शहरों में 2015 में हुए कुल अपराधों की संख्या करीब 6 लाख 76 हजार रही, जिनमें अकेले दिल्ली में हुए अपराधों की संख्या 1 लाख 73 हजार है. यानी 2015 में देश के बड़े शहरों में हुए हर चार में एक अपराध दिल्ली में हुआ. महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या तो दिल्ली में अन्य बड़े शहरों के मुकाबले हैरतअंगेज ढंग से ज्यादा है.

मसलन, 2015 में मुंबई में बलात्कार के 712 मामले प्रकाश में आये, तो दिल्ली में 1,893 मामले यानी दोगुने से भी ज्यादा. बेशक एनसीआरबी के आंकड़ों में उत्तर प्रदेश, बंगाल और महाराष्ट्र जैसे बड़े प्रदेश महिलाओं पर हुए अपराध की संख्या के लिहाज से देश में अव्वल दिखाई दे रहे हैं. लेकिन, देश की राजधानी के मद्देनजर देखें, तो यह तथ्य काफी दुखद है. किसी भी देश की राजधानी में होनेवाली चर्चित घटनाएं उस देश का आईना मानी जाती हैं.

भारत की राजधानी होने के नाते उम्मीद की जा सकती है कि दिल्ली में महिलाएं तुलनात्मक रूप से सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस करती होंगी, लेकिन एनसीआरबी के आंकड़े इस उम्मीद को झूठा साबित करते हैं. ये आंकड़े जहां दिल्ली में सुरक्षा का जिम्मा संभालनेवालों की विफलता का सबूत पेश करते हैं, वहीं संवेदनशील समाज के रूप में हमें चेतने की ताकीद भी करते हैं.

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