भारत के कई राज्य बाढ़ की विभीषिका झेल रहे हैं. उनमें से कई जगह ऐसे हैं जो गर्मी के मौसम में पानी की भयंकर किल्लत से सूखे और अकाल की त्रासदी झेल चुके हैं. इसे सरकारी तंत्र की अदूरदर्शिता नहीं तो और क्या कहेंगे?
इस विभीषिका को दैवीय प्रकोप हर साल मान लेना कहां तक उचित हैं? इस त्रासदी के लिए सरकारी तंत्र तो जिम्मेदार है ही, जनता भी अपनी भूमिका से इनकार नहीं कर सकती. अब समय है, जनता खुले मन से अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करे. वह पेड़ लगाये, ताकि जमीन का कटाव रुके.
नदियों में कूड़ा फेंकना बंद करे. भूमिगत जल का अत्यंत दोहन न करे. हमें कोई भी काम प्रकृति के खिलाफ यह सोच कर नहीं करना चाहिए कि इतने थोड़े में क्या बिगड़ जायेगा. अगर एक बड़ी आबादी थोड़ा -थोड़ा यह समझ कर करे कि इतने से क्या बिगड़ जायेगा, तो थोड़ा-थोड़ा मिला कर बहुत ज्यादा हो जाता है, जिसका नतीजा हमारे सामने है.
सीमा साही, बोकारो
