प्रभात रंजन
कथाकार
जब से गूगल ने रोमन अक्षरों के माध्यम से हिंदी लिखने की सुविधा फोन और कंप्यूटर में मुहैया करायी है, तब से हिंदी में लिखनेवालों की तादाद कई गुना बढ़ गयी है. आप फेसबुक देखें, या ब्लॉग और वेबसाइट देखें, हिंदी में ऑनलाइन सामग्री तेजी से बढ़ रही है.
यह हिंदी भाषा का स्वर्ण काल है. मीडिया में हिंदी का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है. यहां तक कि हाल के दिनों में सेलेब्रिटीज के सोशल मीडिया ट्विटर पर भी हिंदी में स्टेटस लिखने की प्रवृत्ति बढ़ी है. लेकिन, इसी के साथ यह स्यापा भी बढ़ता जा रहा है कि हिंदी शुद्ध नहीं लिखी जा रही है, यानी हिंदी भाषा के प्रयोगों में अराजकता बढ़ रही है.
70 सालों से देशभर में साहित्य की शिक्षा देनेवाले विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के हिंदी विभागों में अब मीडिया और उससे जुड़े माध्यमों की शिक्षा के ऊपर जोर बढ़ा है. लेकिन, आश्चर्य यह होता है कि मीडिया के इन क्लासरूमों में सबसे अधिक शिक्षा यही दी जाती है कि आज का मीडिया भाषा को भ्रष्ट कर रहा है.
मैं खुद हिंदी विभागों से पढ़ कर निकला हूं. दिल्ली विश्वविद्यालय सहित हिंदी पढ़ानेवाले देश के ज्यादातर विभागों में मैंने कभी यह नहीं देखा कि ऐसा कोई पत्र पढ़ाया, जिसमें हिंदी की वर्तनी और उसके भाषा-रूपों को लेकर शिक्षा दी जाती हो. हिंदी विभागों में यह मान कर चला जाता है कि जो भी विद्यार्थी हिंदी पढ़ने आता है, भाषा में दक्षता वह खुद ही हासिल कर लेगा. इसीलिए हिंदी विभागों और हिंदी के व्यावहारिक रूप में अपनानेवाले मीडिया या सोशल मीडिया के माध्यमों के बीच की खाई पहले से और भी अधिक बढ़ गयी है.
यही कारण है कि हिंदी से पीएचडी की शिक्षा प्राप्त विद्यार्थियों को अक्सर इस बात का बुनियादी ज्ञान भी नहीं होता है कि भाषा को संप्रेषणीय बनाने के लिए किस तरह की भाषा लिखी जानी चाहिए, शब्दों का चयन कहां से किया जाना चाहिए? किस तरह के शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए? बात-बात में कोश देखने की सलाह देनेवाले हिंदी विद्वान इस बात का कोई जवाब नहीं दे पाते हैं कि हिंदी के कोश कई दशकों से अपडेट क्यों नहीं हुए? क्यों हिंदी में आज भी सामाजिक विज्ञान के प्रत्ययों के लिए उपयुक्त शब्दों का टोटा पड़ जाता है? क्यों विज्ञान और प्रबंधन से जुड़े विषयों के लिए हिंदी में शब्दों का भारी अभाव है?
भाषा की शुद्धता की बात भी बहुत मजेदार है. मैं हिंदी के दो मूर्धन्य लेखकों के उदहारण देना चाहूंगा. एक फणीश्वरनाथ रेणु का उदाहरण है. उनके उपन्यासों की चर्चा करते हुए एक बार हिंदी के एक महा-आलोचक ने यह तक कह दिया था कि उन्होंने हिंदी को भ्रष्ट कर दिया, क्योंकि उनकी भाषा हिंदी की शुद्ध भाषा नहीं थी. दूसरा उदाहरण मनोहर श्याम जोशी का दिया जा सकता है.
यह जानना दिलचस्प है कि हिंदी में उत्तर आधुनिक लेखन के इस पुरोधा ने एक भी उपन्यास उस हिंदी में लिखा ही नहीं, जिसको मानक हिंदी कहा जाता है. उनके उपन्यासों में बोलचाल के हिंदी का ठाठ है और इसलिए वे जीवंत लगते हैं, हमें अपने जीवन के करीब लगते हैं.
हिंदी की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह अनेक शैलियों में बोली जाती है, लिखी जाती है. उसे एकरूप में देखना उसकी बोलियों की मजबूत विरासत से उसको काटने की कोशिश ही कही जायेगी.
असल में जिसे हिंदी की अशुद्धता कहा जाता है, वही हिंदी की विविधता है. यह अच्छी बात है कि सोशल मीडिया, मीडिया के माध्यमों द्वारा हिंदी की इस विविधता का प्रसार हो रहा है. तथाकथित अशुद्धता हिंदी की जनतांत्रिकता है, जिसको समझे जाने की जरूरत है.
