इतिहास बनते नहीं बनाये जाते हैं और ऐसा ही कुछ हमने रियो ओलिंपिक में देखा, जहां बेशक इतिहास बनते-बनते रह गया हो लेकिन जिस जज्बे के साथ दीपा कर्माकर ने अपनी क्षमता का 100 प्रतिशत दिया, वो यह साबित करता है कि अगर हम अपने खिलाड़ियों पर ध्यान दें तो कोई ताकत हमें गोल्ड मेडल लाने से नहीं रोक सकती़ अगर हमारे खिलाड़ी अभाव में भी अपने लिए संभावना तलाश कर सकते हैं तो हम उनकी इस संभावना को साकार करने के लिए एक छोटी सी पहल तो कर ही सकते हैं.
रियो ओलिंपिक में हमें कुछ मिले न मिले, लेकिन जो सीख हमें इससे मिली है, उसे हमें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. हमारी पिछली सरकारों ने क्या किया, उस पर ध्यान देने से ज्यादा जरूरी यह है कि आगे क्या किया जाये ताकि खिलाड़ियों की इस उड़ान में कोई रुकावट न आये.
रोहित कु पाठक, नयी दिल्ली
