प्रकृति का खेल

पिछले दिनों नदियों में आयी बाढ़ के कारण झारखंड के चार जिले पलामू, गढ़वा, चतरा और लातेहर के नेतरहाट के गांव-घरों में पानी घुस गया जिसके कारण लोग काफी प्रभावित हुए हैं और जनजीवन अस्त-व्यस्त हुआ है़ प्रकृति का गजब का खेल है यह तबाही का मंजर. ढाई महीने पहले तक पानी के लिए तरस […]

पिछले दिनों नदियों में आयी बाढ़ के कारण झारखंड के चार जिले पलामू, गढ़वा, चतरा और लातेहर के नेतरहाट के गांव-घरों में पानी घुस गया जिसके कारण लोग काफी प्रभावित हुए हैं और जनजीवन अस्त-व्यस्त हुआ है़ प्रकृति का गजब का खेल है यह तबाही का मंजर.

ढाई महीने पहले तक पानी के लिए तरस रहे जिले के लोग अब बारिश से परेशान हो गये हैं. इस प्राकृतिक आपदा ने तो चालीस साल का रिकार्ड को तोड़ दिया है. बाढ़ के कारण झारखंड राज्य के चतरा जिला काफी प्रभावित हुआ है़ इस जिले में लगभग 70 गांव टापू का रूप धारण कर चुके हैं. इस तरह की प्राकृतिक आपदा, प्रकृति से हो रहे खिलवाड़ का मूल कारण है.

वृक्षों की अंधाधुंध कटाई करना, बड़े -बड़े पहाड़ों को काट कर गायब कर देना, तेजी से हो रहा बालू का खनन, बड़े-बड़े उद्योगों द्वारा खतरनाक विषैले गैसों का उत्सर्जन करना, कहीं न कहीं प्रकृति को असंतुलित कर रहा है, जिसका परिणाम भयंकर रूपों में सामने आ रहा है. जब तक सरकार से लेकर जनता जागरूक नहीं होगी, प्रकृति का सम्मान नहीं होगा, तब तक यह काल का खेल चलता ही रहेगा. जब तक इस तरह के प्रकृति विरोधी कार्य रुकेंगे नहीं, तब तक लोग प्रकृति के द्वारा रचित आपदाओं का शिकार होते रहेंगे. फिलहाल आपदा प्रबंधन विभाग बाढ़ से पीड़ित जनता को हर तरह के मुहैया देने को सुनिश्चित करे और हुई तबाही का आकलन कर खुद को तबाही से निबटने के अनुरूप बनने की कोशिश करे.

अरुण कुमार साहू, जोरी, चतरा

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