डॉ सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
स्वतंत्रता-दिवस के अवसर पर हम सब देशवासियों का देश के प्रति जो फर्ज बनता है, उसे उतारने का पहला तरीका तो यही हो सकता है कि हम स्वतंत्रता-दिवस को स्वतंत्रता-दिवस ही समझें, गणतंत्र-दिवस न समझ बैठें. स्वतंत्रता-दिवस उस दिन को कहते हैं, जब अंगरेज हमें हमारे हाल पर छोड़ भागे थे. काफी दिन इंतजार करने के बाद जब वे लौट कर नहीं आये, तो फिर एक दिन सब्र करके हमने उन्हीं के तौर-तरीकों को खड़ाऊं की तरह राजगद्दी पर रख कर राज करना तय कर लिया. वह दिन गणतंत्र-दिवस कहलाता है. आगे चल कर तो खैर, हमारे प्रतिनिधि खुद ही अंगरेजों की खड़ाऊं में बदल कर कुरसी पर आसीन हो गये.
देश के बारे में गहराई से जानना भी हमारा एक बड़ा फर्ज है. आइये जानते हैं. अपने इस प्यारे देश का नाम इंडिया है और यहां की राष्ट्रभाषा अंगरेजी है. कुछ ‘सिरफिरे’ लोग इसे भारत या हिंदुस्तान कह कर भी पुकारते हैं और यहां की राष्ट्रभाषा हिंदी होने की गलतफहमी पैदा करने की कोशिश करते हैं, पर गनीमत है कि उनकी बातों में कोई नहीं आता.
देश के अस्सी प्रतिशत लोग खेती पर और बाकी राहत-कार्यों पर निर्भर हैं. हमारे पास संसाधनों का कोई अभाव नहीं. जमीन से कोयला निकलता है, तो कोयले के साथ घोटाला अनायास निकल पड़ता है. कोयले की दलाली में मुंह काला और धन सफेद करना आसान रहता है. यहां सबसे ज्यादा फसल नेताओं की होती है. कहीं-कहीं गेहूं, मक्का, बाजरा भी पैदा होता है, जिसके लिए किसान बारहों महीने पछताता है.
भारत में तीन ओर समुद्र है, जो तस्करों और आतंकवादियों को जान जोखिम में डाल कर भी देश को अपनी बहुमूल्य सेवाएं देने का अवसर उपलब्ध कराता है. भारत में रेगिस्तान भी हैं, जिसमें सबसे काम की चीज रेत होती है.
अमीर उसकी मदद से अपने महल खड़े करते हैं, तो गरीब भूख लगने पर उसे फांक सकते हैं. जहां पर रेगिस्तान नहीं, वहां पर वन हैं, जिनके पेड़-पौधे काट कर ईंधन के तौर पर तो जलाये ही जाते हैं, बहुओं, दलितों और आदिवासियों को जिंदा जलाने के काम में भी लाये जाते हैं. जहां-तहां बलात्कार होते रहते हैं, जिनमें किसी का हाथ-मुंह काला नहीं होता.
भारत जिन चीजों का विदेशों से आयात करता है, उनमें तेल सबसे महत्वपूर्ण पदार्थ है. इस तेल का एक पूल होता है, जिसका घाटा बराबर बढ़ता ही जाता है. उसे कम करने का एक ही उपाय सरकार को कारगर लगता है- वह है तेल की कीमत बढ़ाना. सरकार यह उपाय बड़ी शिद्दत से करती रहती है, यहां तक कि जब अंतरराष्ट्रीय जगत में तेल की कीमतें घटती हैं, तब भी देश में तेल की कीमतें बढ़ती हैं.
निर्यात की प्रमुख मद खाद्यान्न है, जो देशवासियों के स्वास्थ्य की दृष्टि से निहायत जरूरी है. देश में ज्यादा अनाज रहने पर लोग ठूंस-ठूंस कर खाने से मर जायेंगे, जो बिना खाये मरने से ज्यादा शर्मनाक है. सरकार के अथक प्रयासों से बचत भी बढ़ी है. स्थिति यह हो गयी है कि लोगों को बाजार जाने पर पता चलता है कि वे अपनी आय का उपयोग बचत करने के अलावा और किसी चीज के लिए कर ही नहीं सकते.
हमारा देश एक विकासशील देश है और यह बात हम कुछ इस गर्व से कहते हैं कि विकसित देश तक डर जाते हैं.पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने यही बात दोहरा-दोहरा कर अमेरिका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक सबकी मिट्टी खराब कर दी. सब विकसित देश सोच में पड़ गये कि विकासशील होना कहीं विकसित होने से भी ज्यादा श्रेयस्कर तो नहीं?
घर में खाने को अनाज हो न हो, अपने देश पर हमें नाज करना चाहिए, ताकि हमारे प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से यह बता सकें कि जिन्हें नाज है हिंद पर, वे यहां हैं.
