अनुपम त्रिवेदी
राजनीतिक-आर्थिक विश्लेषक
पिछले दो वर्ष देश में सूखे के हालात रहे. पानी की कमी से माॅनसून पर आश्रित हमारी खेती को नुकसान हुआ. अन्नदाता घाटे में रहा. इस वर्ष इंद्र देवता की देश पर बड़ी कृपा है. लगभग पूरे देश में औसत से अधिक वर्षा हो रही है. उत्तरी और पूर्वी राज्यों में जगह-जगह बाढ़ और जल-प्लावन की स्थिति बन गयी है. लाखों हेक्टेयर जमीन पर खड़ी फसल डूब गयी है. किसान फिर मुसीबत में है. सूखा हो या बाढ़, मरना हमारे अन्नदाता को ही है.
देश का मानस किसान की मजबूरी से बेखबर है. 80 रुपये किलो टमाटर हो या 100 रुपये किलो प्याज, सब जगह हाय-तौबा मच जाती है. मध्यम-वर्ग सवाल उठाता है कि हम घर कैसे चलायें. समाचार-पत्र बड़े-बड़े संपादकीय लिखते हैं और राजनीतिक दल सड़कों पर उतर आते हैं. लेकिन, जब यही टमाटर, आलू, प्याज 2-3 रुपये किलो बिकता है, तब कोई यह प्रश्न नहीं पूछता कि किसान अपना घर कैसे चलायेगा? होटल में 300 रुपये की एक प्लेट दाल खानेवाले देश में दालों के बढ़ते दाम पर आंसू बहाते हैं. टिप में 50 रुपये देनेवाले, सब्जी वाले से पांच रुपये के लिए उलझ जाते हैं. अजब विडंबना है.
आज देश में दूसरी हरित-क्रांति की बात हो रही है. लेकिन, इसके पीछे किसान का भला कम, हम सब की मजबूरी ज्यादा है. बढ़ती जनसंख्या की जरूरत पूरी करने के लिए 2020-21 तक भारत को 281 मिलियन टन अनाज की जरूरत होगी. इसके लिए उत्पादन बढ़ाना होगा, पर कृषि-योग्य भूमि लगातार घट रही है. दूसरी हरित-क्रांति से कम भूमि में अधिक उत्पादन के तरीकों पर विचार हो रहा है. लेकिन, क्या हम फिर गलती दोहराने जा रहे हैं?
1960 के दशक में हुई पहली हरित-क्रांति ने हमें भीख का कटोरा उठाने से भले ही बचा लिया हो, पर इसके दूरगामी परिणाम नकारात्मक रहे हैं. 1967 से 1980 तक हमारा अनाज-उत्पादन तेजी से बढ़ा, पर उसके बाद यह धीमा हो गया. उत्पादकता बनाये रखने के लिए रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर हमारी निर्भरता बढ़ती गयी. देश ने इसकी भारी कीमत चुकायी है. जहां एक ओर पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्य समृद्ध हुए, वहीं बिहार, ओड़िशा जैसे पिछड़े इलाके और पिछड़ गये. अर्थव्यवस्था में क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ गया.
पहली हरित-क्रांति में पूरा ध्यान गेहूं और धान पर रहा, परिणामतः जहां गेहूं का उत्पादन 40 गुना बढ़ गया, वहीं ज्वार, बाजरा, रागी जैसे मोटे और पौष्टिक अनाज हमारी थाली से गायब हो गये.
नतीजा, कुपोषण आज राष्ट्रीय समस्या बन गयी है. ऊपर से गलतफहमी यह है कि हरित-क्रांति से हमारे किसान खुशहाल हुए हैं. असलियत तो यह है कि किसान कहीं खुश नहीं है. कृषि आय लगातार घटती जा रही है. हरियाणा में जाट, राजस्थान में गुज्जर और गुजरात में पाटीदार आंदोलन में जिस तरह से कल के समृद्ध किसान नौकरी और आरक्षण के लिए सड़कों पर आ रहे हैं, उससे जाहिर है की खेती से उनका गुजारा नहीं हो रहा है.
एनएसएसओ की 2014 की रिपोर्ट के अनुसार देश के कुल 52 फीसदी कृषि-आश्रित परिवार कर्ज में हैं. हर परिवार पर औसत 47,000 रुपये कर्ज है. बदहाली का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पिछले 17 वर्षों में लगभग तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं. अधिकतर आत्महत्याओं के मूल में कर्ज है, जिसे चुकाने में किसान असमर्थ हैं. पांच राज्यों- महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में किसानों की आत्महत्या की दर सबसे अधिक रही है. महाराष्ट्र की हालत सबसे ज्यादा खराब है, पर गुजरात और पंजाब में भी किसान मौत को गले लगा रहे हैं.
पंजाब में तो दोहरी मार पड़ रही है. यहां कल की उर्वरा-भूमि आज जहरीली हो गयी है. कई इलाकों के पानी, मिट्टी और अन्न-सब्जियों में यूरेनियम तथा रेडॉन के तत्व पाये गये हैं.
आर्सेनिक और फ्लोराइड की उपस्थिति भी दर्ज की गयी है. खेती के लिए कीटनाशकों, उर्वरकों तथा रसायनों के अंधाधुंध उपयोग के कारण पंजाब के मालवा और राजस्थान से लगे बड़े क्षेत्र में कैंसर महामारी की तरह फैल गया है. हालत यह है कि भटिंडा से बीकानेर चलनेवाली एक ट्रेन का नाम ही कैंसर-एक्सप्रेस पड़ गया है, क्योंकि इसमें प्रतिदिन बड़ी संख्या में कैंसर के मरीज पंजाब से अपना इलाज करवाने बीकानेर आते हैं.
पूरे देश में बड़ी संख्या में बेसहारा किसान शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं. 2007 से 2012 के बीच करीब 3.2 करोड़ किसान अपनी जमीन और घर-बार बेच कर शहरों में आ गये. 2011 की जनगणना के अनुसार, हर रोज ढाई हजार किसान खेती छोड़ रहे हैं. नये लोगों में से कोई खेती करना नहीं चाहता.
प्रश्न यह है कि किसान उगायेगा नहीं, तो लोग खायेंगे क्या? बढ़ती आबादी का पेट कौन भरेगा? किसानी कोई करना नहीं चाहता, लेकिन खाना सबको है. इसलिए दूसरी हरित-क्रांति तो चाहिए ही, पर एक समेकित हरित-क्रांति, जो न केवल हमारा अन्न-उत्पादन बढ़ाये, बल्कि हमारे अन्नदाता को भी तरक्की दे. साथ ही, ध्यान न केवल पेट भरने की ओर हो, बल्कि पोषण, पर्यावरण-संरक्षण और ग्रामीण-रोजगार का भी सृजन भी हो.
इसके लिए जरूरी है कि हम विश्व-भर में प्रचलित सफल तकनीकों को अपनायें. इजराइल से ड्राइ-लैंड फार्मिंग सीखें, जो सूखे क्षेत्रों में उत्पादकता बढ़ाये. ब्राजील से वर्षा-जल का प्रबंधन सीखें.
घटती जोत को देखते हुए पोलीहाउस (संरक्षित कृषि), हाइड्रोपोनिक्स और सोयललेस खेती अर्थात् बिना जमीन के कृत्रिम स्थिति में कर सकनेवाली नयी प्रौद्योगिकियों को विकसित करने का प्रयास करें. जैविक-खेती बढ़ायें, क्योंकि प्रयासों के बाद भी इसका दायरा बहुत कम है और उत्पादन काफी महंगा है. सरकार को इसे मिशन-मोड में लेना चाहिए.
आज कृषि को एक लाभकारी व्यवसाय का स्वरूप देना जरूरी है, जिससे किसान अधिक कमा सके और ग्रामीण युवक खेती को दोयम दर्जे का न समझ कर उसे गर्वपूर्वक अपनायें.
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि हम किसान के प्रति अपनी मानसिकता बदलें. हम याद रखें कि दो-तिहाई आबादी को पीछे छोड़ कर न हम आगे बढ़ सकते हैं, न देश आगे बढ़ सकता है.
