सुजाता
युवा कवि एवं लेखिका
क्या स्त्री उम्र बढ़ने के साथ-साथ अपने जेंडर (लिंग) से मुक्त हो पाती है? जैसे मान लीजिए कि 60 की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते इतनी आजादी हासिल कर लेना कि घर में और सदस्यों के होते हुए, ड्राइंग रूम में, बालकनी में बिना झिझक लेट पाना या अंतर्वस्त्र की लगाम से मुक्त होकर घर में या बाहर बाजार तक घूम आना. किसी से कहीं भी खड़े होकर बतिया लेना.
गर्मियों के दिनों में बूढ़ी दादी गांव के घर में कमर के ऊपर सिर्फ एक दुपट्टा ओढ़ कर सो जाया करती थी. क्या ऐसा भी होता है कि भीड़ में स्त्री अपने जेंडर से मुक्त हो जाती है? या ऐसा भी होता होगा कि आपात परिस्थिति में स्त्री उस खास प्रशिक्षण को भूल जाती है, जिसमें वह पली-बढ़ी है! मुसीबत पड़ने पर स्त्री को सब छोटे भाई-बहनों को पढ़ानेवाला घर का कमाऊ पूत भी बनते देखा ही जाता है. उषा प्रियम्वदा के उपन्यास ‘पचपन खंभे लाल दीवारें’ की खुदमुख्तार नायिका बरबस याद आ जाती है, जो हॉस्टल की वॉर्डन है और परिवार का सारा बोझ उसी पर है. लेकिन अंतत: वह भी लोक-लाज से बेपरवाह रहने की कोशिश में हार मानती है.
क्या कभी-कभार धर्म भी औरत के लिए ऐसे जेंडर-फ्री जोन बना पाता है? हरिद्वार के घाटों पर महिलाओं, लड़कियों को बेझिझक एक पेटिकोट बांधे नहाते देखा है और वहीं पुरुषों को उन्हें इस या उस आड़ से घूरते भी देखा है. कपड़े बदल लिये जाने के क्रम में भी वे स्त्रियां निरापद भाव से ‘कुछ-कुछ’ दिख जाने को नजरअंदाज कर देती हैं. जो बड़ी-बूढ़ियां अन्यथा लड़कियों को दुपट्टे और कमीज-सलवार की तहजीब सिखाती हैं, वे ही यहां लड़कियों को कहती पायी जाती हैं- कौन देख रहा है तुझे ही, नाटक मत कर, डुबकी लगा. यहां कोई नैतिक पुलिस नहीं है.
यहां कोई शर्म, रोक-टोक नहीं है. यह बेपरवाही जिस ख्याल से आती है, उसे वर्ग के साथ जोड़ कर देखा जाना भी बहुत आवश्यक है. असुविधाएं और तंगियां एक खास तरह से जेंडर को परिभाषित करती हैं. जब छुपाना और बचना एक महंगा सौदा होता है, तो एक तरफ उघड़ना उस तरह की बेशर्मी नहीं रह जाती, वहीं दूसरी तरफ यह शोषण के लिए स्त्री को खतरे के इलाके में एक आसान शिकार की तरह निरीह बनाती है. कितना सुखद है कुछ पल के लिए यह भूल जाना कि आप ‘स्त्री’ हो और बल्कि उससे ज्यादा यह कि आप ‘स्त्री शरीर’ हो, जिसका स्त्री होना हर वक्त हर स्थिति में याद रखा जाना है. धर्म ने स्त्री के लिए हजार तरह की जकड़बंदियांं न बनायी होतीं और यह सार्वजनिक स्नान धर्म-कर्म के नाम पर न होता, तो हरिद्वार के घाटों को ‘जेंडर मुक्त इलाका’ घोषित किया जा सकता और वहां लिखा जा सकता- ‘थैंक यू फॉर नॉट जेंडरिंग!’
किसी कस्बे में नयी-नवेली नहा कर निकलती है, तो बाहर चौड़े में तार पर, जहां घर-भर के भीतर-बाहर के वस्त्र सुखाये जाते हैं, वहां अपने अंतर्वस्त्र सुखाने में संकोच से गुजरती है, तो कई युक्तियां भी अपनाती हैं कि अपने पढ़े-लिखे और बेशर्म होने पर उसे तंज न सुनने पड़ें और अंतर्वस्त्रों को ठीक से छिपा कर सुखाया जा सके. अक्सर स्त्रियों के अंतर्वस्त्रों को धूप से वंचित रहना पड़ता है, जब वे स्नानघर में सूखते हैं या कमरे में. अपने ही घर के लोगों से छिपा कर उन्हें अपनी खिड़की की रॉड पर सुखा आना कैसा विद्रूप रचता है! दुकान से अपने अंतर्वस्त्र खरीदने में लड़कियों की झिझक को समझना मुश्किल नहीं है, जब विचित्र भाव से दुकान का ‘लड़का’ पूछता है कि- आपका साइज क्या है?
गले में थूक का बड़ा लोथड़ा निगल कर उसे बताना ही होता है, तब भी जब ‘मौका’ देख कर वह मेडिकल स्टोर में जाकर सैनिटरी नैपकिन मांगती है, जबकि उनकी मांएं, चाचियां, दादियां उनके लिए ऐसे काम सुगमता से कर लाती हैं. कभी तकनीक की बात हो, तो किशोरियां अपनी समझ से बड़ी-बूढ़ियों को हैरत में डालती हैं. व्हॉट्सएप्प पर भले ही भजन-कीर्तन और घरेलू बातें ही साझा करती हों, लेकिन स्त्रियों को सीमित आजादी यहां मिली है.
यह कोई अनोखा दृश्य थोड़े है कि इधर बरसात होती है, तो मैदान में लड़के टीशर्ट उतार नहाने लगते हैं और लड़कियां मुंह बिचकाती गुजरती हैं वहां से. टी-20 वर्ल्ड कप जीतने पर खुशी जाहिर करने के लिए धौनी ने मैदान में अपनी टीशर्ट उतार फेंकी थी, तब उसके कुछ दिन पहले ही पूनम पांडे ने भारत की जीत की खुशी में निर्वस्त्र होकर स्टेडियम में आने की बात कही थी.
इसे लोकप्रियता का सस्ता टोटका कह कर खूब लानत-मलामत की गयी थी. आखिरकार इसकी इजाजत बीसीसीआइ ने नहीं दी. सही-गलत की बहस से परे हट कर देखा जा सके, तो केवल दोनों बातों को साथ रखने से शायद कोई सिरा पकड़ में आ सकता है.
फिल्म ‘रंग दे बसंती’ के पोस्टर, जिसमें तीनों नायक शर्ट उतारे हुए हैं, को देख लड़कियों ने अवश्य महसूस किया होगा कि दोस्ती और मुक्ति के आनंद की सार्वजनिक अभिव्यक्ति का यह अंदाज उनके लिए नहीं है. स्त्री को उसकी सीमाएं दिखाता हुआ-सा वह पोस्टर है! जहां ट्यूबवेल हो या पानी मिले, वहां ही नहाना शुरू हो जाते लड़कों को देखना असामान्य नहीं है. यह सार्वजनिक स्नान अभद्रता नहीं लगता! इस मायने में लिरिल साबुन का एक पुराना टीवी विज्ञापन याद आता है, जिसमें एक लड़की गरमी से परेशान, बस की खिड़की से पानी का टैंकर देखती है और नहाने के लिए कूद पड़ती है.
श्लील-अश्लील तय करनेवाले पैमाने बाकी मानकों की तरह ही स्त्री-पुरुष के लिए अलग हैं. एक के लिए अश्लीलता स्वाभाविक और एक के लिए अपराध है. स्त्री कमरे के भीतर स्वयं को कितना भी मुक्त मान ले, लेकिन जिन सड़कों पर वह चलती है, जिन दफ्तरों में वह काम करती है, जिस पार्क में बच्चों को खिलाने ले जाती है, जिस खेत में निराई करती है, जिस भवन के निर्माण साइट पर मजदूरी करती है, जहां सब्जी का मोल-भाव करती है, वहां उसकी आजादी और आजाद ख्याली को लाेग बेमानी कर देते हैं.
कभी उम्र, कभी जगह, कभी वर्गीय स्थिति, कभी तकनीक या व्यक्तिगत चुनाव कभी आजादी का जरा एहसास दे सकते हैं, लेकिन यह पूर्ण आजादी तभी है, जब स्त्री ने वह आजादी सामाजिक मोरचे पर हासिल की हो!
