दबाव में भाजपा!

किसी राज्य के मुख्यमंत्री का इस्तीफा या इस्तीफे की पेशकश कोई साधारण राजनीतिक घटना नहीं होती है. यदि वह राज्य प्रधानमंत्री का गृह राज्य हो, तो उसके संदर्भ और भी विस्तृत हो जाते हैं. आनंदीबेन पटेल द्वारा गुजरात का मुख्यमंत्री पद छोड़ने की मंशा जाहिर करना ऐसा ही एक प्रकरण है जिसके राजनीतिक निहितार्थ बड़े […]

किसी राज्य के मुख्यमंत्री का इस्तीफा या इस्तीफे की पेशकश कोई साधारण राजनीतिक घटना नहीं होती है. यदि वह राज्य प्रधानमंत्री का गृह राज्य हो, तो उसके संदर्भ और भी विस्तृत हो जाते हैं. आनंदीबेन पटेल द्वारा गुजरात का मुख्यमंत्री पद छोड़ने की मंशा जाहिर करना ऐसा ही एक प्रकरण है जिसके राजनीतिक निहितार्थ बड़े गहरे हैं.
राज्य में पिछले साल हुए पाटीदार आंदोलन की आंच अभी कम भी नहीं हुई है और अब दलित आंदोलन खड़ा हो गया है. इन सामाजिक आंदोलनों ने भारतीय जनता पार्टी के आत्मविश्वास को हिला दिया है. राज्य में आम आदमी पार्टी ने भी तेजी से अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है. राष्ट्रीय स्तर पर देखें, तो कश्मीर घाटी में अशांति से निबटने में असफलता और पंजाब में आसन्न हार ने भी भाजपा की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. हाल में असम विधानसभा चुनाव की जीत पिछले साल हुई बिहार और दिल्ली की हार की भरपाई करती नहीं दिख रही है.
यह जगजाहिर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक परीक्षा उत्तर प्रदेश में होगी. ऐसा नहीं लगता है कि गुजरात और देश की हालिया घटनाएं वहां उसे कोई राजनीतिक फायदा पहुंचा रही हैं, बल्कि अनेक विश्लेषकों का मानना है कि नुकसान की संभावना ही अधिक है. लंबे अरसे से उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाशिये पर पड़ी कांग्रेस आगामी चुनाव की तैयारी बहुत ही संजीदगी से करती दिखायी दे रही है.
मंगलवार को प्रधानमंत्री मोदी के चुनाव-क्षेत्र वाराणसी में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का रोड शो इस तैयारी के असर को रेखांकित भी करती है. मध्य प्रदेश और दिल्ली में भी कांग्रेस की गतिविधियां बढ़ी हैं. ऐसे में अगर गुजरात में भाजपा का नियंत्रण कमजोर होता है, तो राज्य की राजनीति में देश के अन्य हिस्सों में उभर रहीं स्थितियों का असर बहुत अधिक हो सकता है.
इस दबाव का ही एक नतीजा है कि मुख्यमंत्री पटेल को अपने इस्तीफे की पेशकश फेसबुक पर करनी पड़ी और वह भी उम्र का बहाना बना कर. यह निहायत ही एक गैरजिम्मेवाराना रवैया है और उनके राजनीतिक आचरण के हल्केपन को जाहिर करता है. कायदे से इस्तीफा देने या इसका इरादा जाहिर करने की जगह सोशल मीडिया नहीं है.
भाजपा को ऐसी प्रवृत्तियों पर भी आत्मचिंतन करना चाहिए. बहरहाल, 2019 का आम चुनाव अभी दूर है और उसके नतीजों के बारे में कयास लगाना ठीक नहीं होगा, परंतु मौजूदा घटनाक्रम यही संकेत करते हैं कि अगर ऐसा ही चलता रहा, तो भाजपा के लिए वह लड़ाई बहुत मुश्किल हो सकती है.

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