आदरणीय प्रधानमंत्री जी! अच्छा लगा इस बार भी आपके द्वारा रेडियो पर दिया गया संदेश ‘मन की बात’. कई आवश्यक बिंदुओं को आपने बताया. आपने 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से संबोधन के लिए विचार प्रेषित करने के लिए निवेदन किया, यह आपके लोकतंत्र के प्रति गहरी निष्ठा का परिचायक है.
एक अति आवश्यक प्रसंग जो भारत के भाल पर बदनुमा दाग बन कर अंकित हो रहा है, आकृष्ट करना चाहता हूं. आज 21वीं सदी का भारत महिलाओं और बच्चियों की अस्मत पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है. आंकड़े बताते हैं कि जितने दुष्कर्म और उत्पीड़न इस सदी में बढ़े हैं, वह चिंताजनक और सारी प्रगति के आंकड़े को मुंह चिढ़ाता नजर आ रहा है.
क्या हम अति संवेदनशील भारत की अस्मिता के चिंतक प्रधानमंत्री से आशा कर सकते हैं कि अपने संबोधन में इसे गंभीरतापूर्वक शामिल करेंगे और अपनी ओर से कोई दिशा प्रदान करेंगे. हमारे ग्रंथाें में लिखा है कि जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवताओं का वास होता है. आज नारियों की अस्मत जब जब तार-तार होती है, हर जगह केवल बहस ही होती है.
अरुण सज्जन, ई-मेल से
