गांधी की हत्या किसने की?

चंदन श्रीवास्तव एसोसिएट फेलो, कॉमनकॉज कुछ यक्ष-प्रश्न होते हैं, उनका अंतिम उत्तर नहीं होता, जैसे यही कि गांधी का हत्यारा कौन? राहुल गांधी के बयान पर आये अदालती निर्देश के बाद फिर यह सवाल उठा है. अदालत का तर्क है कि ‘नाथूराम गोडसे आरएसएस का कार्यकर्ता था. लेकिन इसके आधार पर आप (राहुल गांधी) पूरे […]

चंदन श्रीवास्तव
एसोसिएट फेलो, कॉमनकॉज
कुछ यक्ष-प्रश्न होते हैं, उनका अंतिम उत्तर नहीं होता, जैसे यही कि गांधी का हत्यारा कौन? राहुल गांधी के बयान पर आये अदालती निर्देश के बाद फिर यह सवाल उठा है. अदालत का तर्क है कि ‘नाथूराम गोडसे आरएसएस का कार्यकर्ता था. लेकिन इसके आधार पर आप (राहुल गांधी) पूरे समूह की निंदा नहीं कर सकते (कि आरएसएस ने गांधीजी को मारा). अगर आपने कहा होता कि आरएसएस के कुछ लोगों ने गांधीजी को मारा, तो बात दूसरी होती, लेकिन आपने कहा कि आरएसएस ने गांधीजी को मारा.’ सो माफी मांगिये या अदालती कार्रवाई के लिए तैयार रहिये.
अदालत की बात युक्तिसंगत है. सिद्धांत यही है कि व्यक्ति के दोषों की जिम्मेवारी उसके समुदाय पर नहीं डाली जा सकती. आखिर इसी सिद्धांत से बाबरी-मसजिद के विध्वंस के बाद अदम गोंडवी के शेर का यह टुकड़ा मशहूर हुआ कि गलतियां बाबर की थी, जुम्मन का घर फिर क्यों जले? किसी अपराध के लिए व्यक्ति दोषी या साथ-साथ उसका समुदाय भी? व्यक्ति ने जिस समुदाय में जन्म लिया, उसकी रीति-नीति से अलग भी व्यक्ति की क्या कोई निजी गति और मति हो सकती है? यह प्रश्न गांधी की हत्या के प्रसंग में विचारोत्तेजक है. गोडसे और गांधी इन सवालों के दो विपरीत ध्रुव पर खड़े हैं.
गांधी खुद को सनातनी हिंदू कहते थे, लेकिन अपने हिंदू होने को उन्होंने निजी अनुभव के आधार पर गढ़ा.यह आधार प्रेमजन्य अहिंसा का था. गोडसे की नजर में गांधी ठीक इसी कारण हिंदू समुदाय को भ्रष्ट करने के दोषी थे. सावरकर के हिंदू-राष्ट्र के विचार का अनुयायी गोडसे यह कैसे मान लेता कि अपने धर्म-समुदाय से अलग भी व्यक्ति का स्वतंत्र अस्तित्व होता और हो सकता है और भारतभूमि में यह सोच आज की नहीं, बल्कि कबीरदास के पहले से चली आ रही है.
परशुराम चतुर्वेदी ने ‘उत्तर भारत की संत-पंरपरा’ में लिखा है ‘महात्मा गांधी ने कबीर साहब आदि संतों की भांति पदों व साखियों की रचना नहीं की और ना उनकी भांति उपदेश देते फिरने का ही कोई कार्यक्रम रखा, परंतु जिस प्रकार उन्होंने अपने निजी अनुभवों के आधार पर अपने सिद्धांत स्थिर किये और उन्हें अपने जीवन के प्रत्येक पल में व्यवहृत कर दिखाया, वह ठीक उन संतों के ही अनुसार था.’
सावरकर के हिंदू-राष्ट्र के विचार का कोई अनुयायी नहीं मान सकता कि व्यक्ति के निजी अनुभव से उपजा सत्य ही उसके कर्मों का आधार है और होना चाहिए. सावरकर साफ कहते हैं कि जो भूमि जिस समुदाय की पितृभूमि और पुण्यभूमि एक साथ हो, वही उसका राष्ट्र होती है.
जैसे व्यक्ति का अपने जन्म पर वश नहीं, वैसे ही पितृभूमि और पुण्यभूमि भी उसके वशवर्ती नहीं. ईश्वर, ईशवाणी कही जानेवाली पुस्तकें या फिर समुदायगत आचरण के सिद्धांत जैसे जाति के नियम के समान ये प्रदत्त ही हो सकते हैं, अर्जित नहीं. प्रदत्त होते ही कोई चीज प्रश्नों के दायरे से बाहर चली जाती है, आप उन्हें स्वीकार कर सम्मान के भागी बन सकते हैं, अस्वीकार कर दंड भुगत सकते हैं, लेकिन निज अनुभव से उनमें कुछ मनुष्य विरोधी पाकर अच्छाई के लिए बदलाव नहीं कर सकते.
गोडसे को लगा गांधी हिंदू समुदाय की आचरण संहिता में बदलाव के दोषी हैं. उनका संकल्प हिंदू-मुसलिम एकता का है, जबकि यह राष्ट्र ‘जन्मभूमि और पुण्यभूमि’ होने की वजह से प्राथमिक रूप से हिंदुओं का है.
गोडसे की विचारशैली उससे गांधी को दंड ही दिलवा सकती थी. आरएसएस की विचार-यात्रा के अध्येता वाॅल्टर एंडरसन ने गांधी की हत्या के प्रसंग में नाथूराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे को यह कहते उद्धृत किया है कि ‘हम लोग तो बस उस आदमी से छुटकारा भर चाहते थे, जिसने इस राष्ट्र का बहुत नुकसान किया था और करता चला आ रहा था.
उसने (गांधी) लगातार हिंदू राष्ट्र का अपमान किया और अहिंसा के सिद्धांत से इसे कमजोर किया. अपने कई उपवासों में उसने मुसलमानों के हित में शर्तें रखीं, जबकि मुसलिम धर्मांधों के बारे में कुछ ना किया.’ आरएसएस के सरसंघचालक एमएस गोलवरकर के ‘बंच ऑफ थॉट‍‍्स’ में भी गांधी की अहिंसा को लक्ष्य कर लिखा हुआ मिलता है कि हमारे नेतागण मानो अपने ही लोगों को ‘पौरुषहीन करने को संकल्पबद्ध’ हैं और पूरे विश्व-इतिहास में इस ‘विश्वासघात का कोई सानी’ नहीं है.
मुसलमान की छोड़ी रीति/अरु हिंदू की भानै छीति/ ता तैं हमें माने नहीं कोई/जब लग जुलाहा कासी होई-’ मानुष-प्रेम के ढाई आखर सिखानेवाले कबीर के बारे में शिकायत की गयी सिकंदर लोदी के दरबार में. बीसवीं सदी में मानुष-प्रेम सिखानेवाले गांधी से हिंदू और मुसलिम समुदाय के झंडाबरदारों को कमोबेश यही शिकायत थी. गांधी के रहते उन्हें कौन मानता? सो एक ने अपना पाकिस्तान बनाया, दूसरे ने गांधी को मारा.

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