गिरींद्र नाथ झा
ब्लॉगर एवं किसान
बारिश के बाद हल्की हवा चल रही है. धान के खेत में पानी लगा हुआ है. मेढक की आवाज आ रही है. बारिश खत्म होने के बाद आसमान हल्का साफ है. आसमान में बादलों के संग तारे टिमटिमा रहे हैं. गांव के अपने कमरे में बैठा हूं. टेबल पर खालिद हुसैनी की किताब द काइट रनर है, लेकिन किताब के पन्नों से इतर मन अचानक चनका-पूर्णिया से दिल्ली पहुंच गया है.
दिल्ली के मुखर्जी नगर और गांधी विहार से मन के तार अचानक जुड़ गये हैं. वही इलाका कॉलेज के दिनों में अपना मोहल्ला था. बत्रा सिनेमा से कुछ कदम आगे बैंक का एटीएम और उसके सामने आम और केले का लाजवाब जूस बनानेवाले सरदार जी का स्टॉल याद आ रहा है, पता नहीं ये दोनों अब वहां हैं या नहीं और हैं तो किस रूप में. रोशनी में डूबे मुखर्जी नगर में हम शाम ढलते ही एक घंटे के लिए आते थे- गर्मी में सरदार जी के स्टाल पर जूस पीने और उसके सामने चारपाई पर बिछी पत्र-पत्रिकाओं में कुछ देर तक खोने के लिए.
आज पता नहीं क्यों एक साथ इतना कुछ याद आ रहा है? सचमुच मन बड़ा चंचल होता है. मुखर्जी नगर का वह चावला रेस्तरां, जहां बिहार की हॉस्टल वाली जिंदगी से निकलने के बाद पहली दफे चाइनीज व्यंजनों का मजा उठाया था. उस वक्त लगा कि यह रेस्तरां नहीं, बल्कि पांच सितारा होटल है.
हम पहली बार किसी रेस्तरां में खाये थे. उस रेस्तरां के बगल से एक गली आगे निकलती थी, जिसमें इंडियन सिविल सर्विसेज का कारखाना है, मतलब कोंचिग सेंटर. उस गली में खूब पढ़नेवाले लोगों का आना-जाना लगा रहता था. ऐसे लोगों को हम सब ‘बाबा’ कहते थे. पता नहीं अब क्या कहा जाता है.
इस वक्त खुद को मैंने 2002 यानी 14 साल पीछे ले जाकर खड़ा कर दिया है. वह ‘फेसबुक-काल’ नहीं था. वह तो बस मौखिक काल था. हम आमने-सामने बैठ कर लंबी बतकही किया करते थे.
मैं याद करता हूं तो स्मृति में मुखर्जी नगर और गांधी विहार के बीच एक बदबूदार पुलिया आ जाती है. लेकिन उस बदबू में भी अपना मन रम जाता था. पूरे दिल्ली में उस वक्त केवल मेरे लिए, एक वही जगह थी, जहां पहुंच कर मैं सहज महसूस करता था. दरअसल, उस पुलिया पर मुझे गाम के कोसी प्रोजेक्ट नहर का आभास होता था. मेरे भीतर का गांव वहां एक झटके में बाहर निकल पड़ता और मैं मन-ही-मन खुश हो जाता था.
इस वक्त मुझे 81 नंबर की बस याद आ रही है, फटफट आवाज करते शेयर वाले ऑटो, रंगीन रिक्शे… ये सब आंखों के सामने तैर रहे हैं. मैं अब इंदिरा विहार की तरफ पहुंच जाता हूं. वहां एक बस स्टॉप था, जिसका नाम था- मुखर्जी नगर मोड़. मैं उस मोड़ पर 912 नंबर की बस का इंतजार करता था, सत्यवती काॅलेज जाने के लिए. मेरा वैसे तो अंक गणित कमजोर रहा है, लेकिन बस के अंकों में कभी मैं मात नहीं खाया.
कॉलेज की पढ़ाई के दौरान मुखर्जी नगर के आसपास का इलाका हमारा गांव हो गया था, जिसके मोहल्ले, गलियां, पार्क आदि मेरे लिए गाम के टोले की तरह हो चले थे. सब जगह अपने इलाके के लोग मिल जाते. इसलिए उस शहर ने कभी भी मेरे भीतर के गांव को दबाने की कोशिश नहीं की, क्योंकि हम बाहर-बाहर शहर जीते थे और भीतर-भीतर गांव को बनाये रखने की पूरी कोशिश करते हुए अंचल की सांस्कृतिक स्मृति को मन की पोथी में संजोते हुए शहर को जी रहे थे.
बारिश खत्म होने के बाद लगता है इस रात वह शहर आपके किसान के मन में झपकी ले रहा है कि तभी धान के खेत से मेढकों की टर्र-टर्र आवाज ने अंचल की रात का अहसास करा दिया और मैं फिल्म गुलाल के गीत- जब शहर हमारा सोता है… में खो गया.
