शाह आलम
सामाजिक कार्यकर्ता
‘जब मैंने सुलह की पैरवी की थी, तब हिंदू महासभा सुप्रीम कोर्ट चली गयी. महंत ज्ञानदास ने पूरी कोशिश की थी कि हम हिंदुओं-मुसलिमों को इकट्ठा करके मामले को सुलझायें, लेकिन अब मुकदमे का फैसला कयामत तक नहीं हो सकता है. इस मुद्दे को लेकर नेता अपनी रोटियां सेक रहे हैं… बहुत हो गया अब.’
यह कहते हुए रामजन्म भूमि-बाबरी मसजिद मुकदमे के मूल मुद्दई और बाबरी मसजिद के पैरोकार हाशिम अंसारी ने आगे मुकदमे की पैरवी करने से मना कर दिया था. इस इनकार और मुकदमे के सुलझने के नाकाम इंतजार में जो दर्द बयां हुआ है, वह हाशिम अंसारी की उस समृद्ध विरासत से आता है, जो उनके पिता और दादा छोड़ गये हैं.
हाशिम अंसारी के इस बयान और दिल पर पत्थर रख कर किये गये इस कड़े फैसले की अहमियत को समझने के लिए जरूरी है कि हम उनके दिलो-दिमाग को एक बार जान सकें, जिसमें गंगा-जमुनी तहजीब की आनुवांशिक रवायत पैबस्त है.
अयोध्या के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक कनक भवन है. इसका निर्माण टीकमगढ़ रियासत की महारानी ने करवाया था. इसी कनक भवन में हाशिम अंसारी के दादा सिपाही थे, जो सामान्य दिनों से लेकर मेलों और मंदिरों के उत्सवों तक मंदिर की देखभाल पूरी जिम्मेवारी से करते थे.
हाशिम के पिता ने उनके दादा से अलग हट कर सिलाई का पेशा चुना. हाशिम अंसारी ने भी अपनी जीविका के लिए सिलाई का काम कई साल तक किया. अयोध्या के मुख्य बाजार शृंगार हाट में उनकी सिलाई की दुकान थी. वे कुशल दर्जी माने जाते थे. कभी हाशिम के हाथों ही अयोध्या के मंदिरों में भगवान के कपड़े सिले जाते थे. इसके एवज में उन्हें मंदिरों में चढ़ा हुआ प्रसाद लड्डू मिलता था, पैसे नहीं. हाशिम ने भी कभी इस काम के लिए पैसों की मांग नहीं की. ठीक इसी तरह साधुओं का बाल काटने का काम करनेवाले मुसलिम नाई को पैसे की जगह मंदिरों का यही प्रसाद दिया जाता था.
22-23 दिसंबर, 1949 की दरम्यानी रात बाबरी मसजिद में मूर्ति रखे जाने का विरोध हुआ.खुफिया पुलिस ने हाशिम का नाम भी तकरीर करनेवालों में जोड़ दिया. अधिकारी के पास पेशी हुई, तो उसने हाशिम से पूछा कि क्या काम करते हो? उन्होंने कहा कि, ‘साहब मैं दर्जी हूं’. अधिकारी ने कहा कि दर्जी ऐसा काम नहीं कर सकता. इसलिए इनका नाम सूची से काट दिया गया. इसके बाद उन्होंने सिलाई करना छोड़ दिया.
हाशिम अयोध्या रेलवे स्टेशन के नजदीक मोहल्ला कुटिया में एक साधारण घर में परिवार के साथ रहते थे.उनका एक बेटा है, जिसकी ड्राइवरी से घर का खर्च चलता है. हाशिम इसी हालत में लगभग छह दशक से बाबरी मसजिद मुकदमे की पैरवी करते रहे, लेकिन उन्होंने मसजिद के नाम पर न तो कभी चंदा इकट्ठा किया और न ही अपनी सादगी बदली. वे चाहते तो मसजिद के नाम पर करोड़ों का चंदा इकट्ठा कर सकते थे, लेकिन इसके लिए उनका जमीर तैयार नहीं था. यह फक्कड़ आदमी अयोध्या नगरी की तासीर था, जो हमेशा एक लुंगी-कमीज या कुर्ते में ही दिखा.
वहीं मंदिर-मसजिद के नाम पर सियासतदानों का कारोबार खूब फला-फूला. अयोध्या के नाम पर दुकान चमकानेवाले मुसीबत के वक्त किनारा कर लेंगे, ऐसा किसी ने सोचा नहीं था.
जुलाई 2014 के प्रथम सप्ताह में हाशिम अंसारी की तबीयत अचानक बिगड़ने पर परिवार ने पास के श्रीराम अस्पताल में उन्हें भर्ती कराया. डॉक्टरों ने ऑपरेशन के लिए उन्हें किंग जाॅर्ज मेडिकल विश्वविद्यालय, लखनऊ भेज दिया, लेकिन तय समय पर ऑपरेशन इसलिए नहीं हो पाया, क्योंकि परिवार के पास पैसे नहीं थे. हालांकि, बाद में परिवार ने किसी तरह से पचास हजार रुपए जुटा कर हाशिम का ऑपरेशन कराया.बाबरी मसजिद/रामजन्म भूमि विवाद को कोर्ट से बाहर सुलझाने को लेकर उन्होंने अयोध्या के प्रमुख महंतों के साथ कई बार कोशिश की. हाशिम के ईमानदारी से किये गये शांति प्रयासों की वजह से ही कोई भी आदमी जब उनके घर के सामने से गुजरता था, तो इनके सम्मान में नमस्ते कहते हुए बड़े अदब से अपना सिर झुका देता था.
हाशिम अंसारी जैसे नेकदिल इंसान को मीडिया ने भले ही बड़े विवाद का चेहरा बना दिया हो, लेकिन अयोध्या की धूनी रंगत में उनके चाहनेवालों की फेहरिस्त बहुत लंबी है. मरहूम हाशिम के प्रति लोगों के दिलों में प्यार का ही नतीजा था कि उनके जीते जी उन्हें बीड़ी और चाय पिलानेवालों की कभी कमी नहीं रही.
अयोध्यावासियों के दिलों में बसा यह शख्स भले ही दूसरी दुनिया में चला गया हो, लेकिन उसकी खूबियां और विरासत आनेवाली पीढ़ियों को रोशन करती रहेंगी. अफसोस, बीते 24 बरस से हर साल छह दिसंबर को अयोध्या में मनाये जानेवाले यौम-ए-गम यानी शोक दिवस में यह शख्स अब नहीं रहेगा. हाशिम अंसारी की मौत के साथ ही बाबरी मसजिद की लड़ाई के इतिहास का एक चक्र भी पूरा हो गया.
