अगर लड़कियां और औरतें अपने घर के मर्दों से डरती होतीं तो औरतों के खिलाफ इतने अपराध नहीं होते, इज्जत के नाम पर हत्याएं नहीं होतीं. कोई शहरी, पढ़ा-लिखा, खाता-पीता परिवार और उसका मुखिया भी संभवत: ऐसी सोच रखता होगा, लेकिन एक लोकतांत्रिक देश में अपने पक्ष में इसे बयान की तरह पेश करने का दुस्साहस किसी खाप पंचायत के नेता का ही हो सकता है. हरियाणा और उत्तर प्रदेश की खाप पंचायतों के समूह के प्रतिनिधियों की नजर में ऑनर किलिंग की समस्या का इलाज यह था कि हिंदू विवाह कानून में बदलाव करके एक गोत्र में शादी प्रतिबंधित कर दी जाये, तो इज्जत के नाम पर हत्याएं बंद हो जायेंगी. यह कहने की जरूरत नहीं है कि ‘ऑनर किलिंग’ सिर्फ एक गोत्र में विवाह करने का मसला नहीं है. न ही यह सिर्फ किसी एक धर्म या देश तक सीमित है.
अपने सबसे वीभत्स रूप में, पितृसत्ता खुद को बनाये रखने के लिए ऑनर किलिंग जैसे अपराध को अंजाम देती है और गुलामों को संदेश देती है कि गद्दारी बरदाश्त नहीं की जायेगी. जिस ‘इज्जत’ के लिए हत्याएं होती हैं, वह पुरुष की इज्जत है, जिसे परिवार की इज्जत बना दिया जाता है. स्त्री की देह और यौनिकता पर परिवार का पहला हक है, इसलिए वह जिये या मरे, यह तय करने का अधिकार भी परंपरागत और रूढ़िवादी परिवार कानून से भी ऊपर जाकर अपने पास रखते हैं. ‘मेरा बच्चा है, मैं मारूं या प्यार करूं’- वाले तर्क से स्त्री का चयन और स्वतंत्रता परिवार के लिए अपमान का विषय हो जाती है और उसे दंडित किये जाने को समाज गलत नहीं मानता. यह किसी एक धर्म या दुनिया में किसी एक जगह से जुड़ी हुई बात नहीं है. सामाजिक कार्यकर्ता इसे एक सांस्कृतिक समस्या की तरह देखते हैं. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, पूरे विश्व में, ऐसी हत्याएं (एक साल में 5,000 हत्याएं) होती हैं. यह आंकड़ा अधिक हो सकता है, क्योंकि शर्मिंदगी से जुड़ा विषय होने के कारण ऐसे मामले पुलिस में रिपोर्ट नहीं होते. जॉर्डन, सीरिया, पाकिस्तान, भारत, अरब देशों में ऐसी घटनाएं लगातार हो रही हैं. परपुरुष से संबंध होने मात्र के शक से या विवाह पूर्व यौनिक संबंध, अपनी मर्जी से शादी की सजा में स्त्री की अपने ही परिवार द्वारा हत्या कर दिये जाने के समाचार देखे-सुने जाते रहे हैं; हिंदू, मुसलिम, सिख धर्म में भी. अकेले भारत में यह आंकड़ा सालभर में एक हजार हत्याओं का है और इतना ही पाकिस्तान का भी. आज दुनिया में जहां यह दिखाई नहीं देता, वहां भी एक जमाने में परिवार की ‘शान’ में गुस्ताखी के लिए औरतों की उनके ही परिवार वाले हत्या कर देते थे. गौरतलब है कि फ्रांसीसी क्रांति से पूर्व तक भी, पत्नी को बेवफाई के लिए मौत की सजा देने पर पति को कानून माफ कर देता था.
दुनियाभर में ऐसे कितने बाप,भाई और ताऊ हैं, जो इज्जत के नाम पर घर के बच्चों, विशेषकर लड़कियों से जीने का हक छीन लेते हैं और कितनी ही ऐसी मांएं, बहनें, दादियां हैं, जो चुपचाप यह देखती हैं. वस्तु की तरह द्रौपदी को दावं पर लगाया जा सकता था. औरत जब तक संपत्ति समझी जाती रहेगी, तब तक स्त्री की यौनिकता और प्रजनन को नियंत्रित करने के लिए ऐसे अपराध होते रहेंगे. स्त्री-जननांगों को सिल दिया जाना और शुचिता की गारंटी के लिए चेस्टिटी बेल्ट पहनाने जैसी घृणित प्रथाओं की ही श्रेणी में है इज्जत के नाम पर औरत से जीने का हक छीन लिया जाना. हाल ही में पाकिस्तानी सोशल मीडिया सिलेब्रिटी कंदील बलोच की उसके अपने भाई ने ही हत्या कर दी. आत्मप्रचार के लिए कंदील अपनी उत्तेजक सेल्फी, वीडियो और उन्मुक्त बयान सोशल साइट्स पर पोस्ट किया करती थी और हजारों की संख्या में उसके प्रशंसक थे. अपने उन्मुक्त आचरण से वह परिवार की ‘इज्जत’ की धज्जियां उड़ा रही थी, मौलवी कावी के साथ उनकी सेल्फी विवादित हुई.
पाकिस्तानी अखबार ‘डाॅन’ के मुताबिक, अपने एक साक्षात्कार में कंदील ने कहा था कि यह उसका प्रतिशोध है उस समाज से, जो लड़कियों की आजादी से डरता है, ‘इस मर्दों के समाज में औरत के लिए कुछ भी अच्छा नहीं है. इस देश से यह मेरा प्रतिशोध है. यह मैं खुशी से नहीं करती.’ जिन लड़कियों की कम उम्र में जबरन शादी कर दी जाती है, उनके लिए वह मिसाल बनना चाहती थी. हम उसके रास्ते और मंजिल पर बहस कर सकते हैं, लेकिन 17 साल की उम्र में जिस लड़की की शादी कर दी गयी, उसके लिए अपने दकियानूसी समाज में निकलना और खुद को स्थापित करना खतरों से खाली न था! आत्मनिर्भर होने के बाद कंदील ने अपने अभिभावकों को सहारा दिया. कंदील के पिता ने ही हत्या की रिपोर्ट दर्ज करायी. सोशल साइट्स पर कंदील के कई हमवतनों ने ही उसकी मौत पर खुशी जाहिर की.
‘किलिंग इन द नेम ऑफ ऑनर’ 2010 में आयी, जॉर्डन की एक पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता राना हुसैनी की किताब है, जिसमें उन्होने जॉर्डन में ऑनर किलिंग के कई सच्चे, हाइ प्रोफाइल केस दर्ज किये हैं. यह सोचना भी खौफनाक है कि इज्जत के नाम पर अपने परिवार द्वारा अपनी हत्या किये जाने के भय से जॉर्डन में औरतों ने जेलों में शरण ली, जहां वे कम-से-कम अपने परिवार की पहुंच से बाहर थीं. जॉर्डन इस संदर्भ में तेजी से बदलाव की तरफ बढ़ा है, जहां पिछले 5 वर्षों में नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) ने सामने आकर ऐसी हत्याओं का विरोध किया और कानून सक्रिय हुआ.
संस्कार बचेंगे, तो परिवार बचेगा. परिवार बचेंगे, तो समाज बचेगा. समाज बचेगा, तो देश बचेगा… खाप पंचायतों और न जाने कितने संस्कारवादियों का नारा है यह और इसमें छुपा हुआ संदेश यह है कि इसके लिए जान लेनी-देनी पड़े, तो उसमें गलत क्या है! फिर हमें संविधान की आवश्यकता है ही क्यों? न्याय, बराबरी, धार्मिक सहिष्णुता, भिन्नताओं के सम्मान के बिना कोई देश वाकई बच सकता है क्या? परिवार और समाज के लिए ‘स्थायित्व’ एक सबसे जरूरी मकसद हो सकता है, जिसमें बराबरी और न्याय गैरजरूरी हों. लेकिन न्याय, बराबरी और स्वतंत्रता के बिना किसी देश के बचे रहने की कामना किसी गर्त में ही ले जायेगी. ऐसी मिसालें हमारे सामने हैं.
सुजाता
युवा कवि एवं लेखिका
chokherbali78@gmail.com
