रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार
इस वर्ष 28 जुलाई को डॉ नामवर सिंह नब्बे वर्ष के हो रहे हैं. उनके स्वस्थ जीवन और शतायु होने की मंगलकामनाएं समस्त हिंदी संसार करेगा. रामचंद्र शुक्ल को अपने जीवन-काल में उतनी यश – ख्याति नहीं मिली, जितनी नामवर सिंह को. इसका एक मुख्य कारण आधुनिक और समकालीन साहित्य को आलोचना के केंद्र में रखना है. ‘हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योगदान’ (1952), ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा’ (1956) और अपने गुरुवर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के साथ ‘पृथ्वीराज रासो’ के संपादन (1953) के बाद वे फिर कभी प्राचीन साहित्य की ओर नहीं मुड़े. एमए के आखिरी वर्ष (1950) में द्विवेदी जी के छात्र बनने के बाद उन्होंने द्विवेदी जी से जो ज्ञान – समझ प्राप्त की, वह अधिक मूल्यवान रही.
द्विवेदी जी ने जिस प्रकार भक्तिकाल पर विचार करते हुए संपूर्ण भारतीय साहित्य को ध्यान में रखा, उसी प्रकार नामवर ने भारतीय कथा – साहित्य पर अपनी दृष्टि केंद्रित की. वे अपनी नयी, मौलिक उद्भावनाओं – स्थापनाओं के लिए सुविख्यात हैं. भारतीय उपन्यास के उदय को उन्होंने ‘मध्य वर्ग’ से न जोड़ कर ‘किसानों’ से जोड़ा. अंगरेजी में जिसे ‘क्लोज रीडिंग’ कहते हैं, वह नामवर के यहां किसी भी आलोचक से कहीं अधिक है.
उन्होंने एक साथ ‘टेक्स्ट’ और ‘कॉन्टेक्स्ट’ को महत्व दिया. उनकी आलोचना समय-समाज-सापेक्ष है. ‘गोदान’ को उन्होंने ‘पॉलिटिकल क्रिटिक’ माना, उसे ‘साहित्यकार की पुकार’ के रूप में देखा और ‘गाय’ को रूपक और प्रतीक के अर्थ में देखा. होरी को खुद गाय कहा.
पचास के दशक के मध्य से ही वे मुख्यत: समकालीन साहित्य की आलोचना में प्रवृत्त हुए. हिंदी में कहानी के ‘पहले और प्रमुख आलोचक’ नामवर ही हैं. मुक्तिबोध को उन्होंने केंद्र में उपस्थित किया और धूमिल की पहचान की. नामवर के लेखों, भाषणों, व्याख्यानों, दिये गये साक्षात्कारों के साथ उनके दो प्रमुख रूप और हैं. ‘आलोचना’ के संपादक वे 1967 में हुए और जीवंत बहसें आरंभ कीं. जेएनयू में वे 1974 में आये और जिस प्रकार का ‘कोर्स’ उन्होंने डिजाइन किया, वह एक मानक है. उन्होंने विभाग को ही नहीं, जेएनयू को भी ‘हिंदी का ठाठ’ प्रदान किया. छायावाद के बाद (1954) उन्होंने किसी वाद और युग – विशेष पर कोई पुस्तक नहीं लिखी. ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां’ (1954) के बाद उन्होंने नयी कविता, नयी कहानी, कथा – साहित्य की प्रवृत्तियों पर स्वतंत्र रूप से कोई पुस्तक नहीं लिखी.
कहानी पर ‘कहानी’ और ‘नयी कहानियां’ में धारावाहिक लेखन के बाद इतने सुव्यवस्थित ढंग से किसी विधा, युग, सिद्धांत आदि पर धारावाहिक लेखन नहीं किया. ‘आलोचना’ के पहले वे ‘जनयुग’ के संपादक रहे. उनकी आलोचना का मुख्य क्षेत्र कविता है. उसके बाद कथा – साहित्य. अन्य साहित्य – रूप उन्हें कभी लुभा नहीं सके. ‘कविता के नये प्रतिमान’ (1969) में कई आलोचकों ने ‘इतिहास और आलोचना’ (1957) से उन्हें भिन्न मार्ग निर्मित करते देखा.
रामविलास शर्मा की तरह नामवर ‘क्लासिकल’ मार्क्सवादी नहीं हैं. वे ‘फ्रैंकफर्ट स्कूल’ की तरह कोई स्कूल नहीं बना सके. फिर भी नामवर में एक जादू है, एक चमक और कौंध है. उनके शिष्यों की परंपरा बड़ी है. क्या नामवर ने भी हिंदी में आलोचना की कोई दूसरी परंपरा निर्मित की है? ‘वाद, विवाद, संवाद’ (1989) के पहले उन्होंने ‘दूसरी परंपरा की खोज’ (1982) कर ली थी.
नामवर की दृष्टि बेधक है. स्मृति, अब जितनी कमजोर हो रही हो, अद्भुत है. जो उनके कुछ विचारों से असहमति रखते हैं, नामवर उनकी भी प्रशंसा करते हैं. उनसे असहमत लोगों को उनका मुकम्मल अध्ययन करने की जरूरत है, जो अभी तक नहीं हुआ है. उनकी लेखनी से अधिक उनकी वाणी आकर्षित करती है.
साठ वर्ष तक (1955 से) हिंदी आलोचना में ही नहीं, भारतीय आलोचना में भी कोई आलोचक इतना चर्चित, महत्वपूर्ण, विवादास्पद नहीं रहा. स्वतंत्र भारत में रचनाकार की तुलना में एक आलोचक का सर्वप्रमुख बन जाना बड़ी बात है. जिन्होंने नामवर को कायदे से नहीं पढ़ा है, वे भी नामवर – नामवर बोलते हैं. ‘अंदाज-ए-नामवर’ इसका एक प्रमुख कारण है.
स्वतंत्र भारत के हिंदी साहित्य, हिंदी समाज, हिंदी आलोचना को समझने के लिए नामवर आवश्यक हैं. उन्होंने कलावादियों, रूपवादियों (अवसरवादियों नहीं!) और मार्क्सवादियों से भी जो टक्करें ली हैं, उन पर ध्यान देना चाहिए. नामवर नब्बे वर्ष के हो रहे हैं, बड़ी बात है.
फिलहाल उन्हें नब्बे फूलों का गुलदस्ता भेंट करना चाहिए. यह मंगलकामना करनी चाहिए कि उनकी स्वस्थ उपस्थिति में हिंदी समाज उनकी शतवार्षिकी मनाये. संभव है, इस दस वर्ष के बीच उन पर सुचिंतित, सुविचारित, तथ्यपरक और तर्कपरक विचार हो. उनका सही और वास्तविक मूल्यांकन हो. उनके लिए केवल मंगलकामनाएं!
