मन में न जाने कितने उत्साह लिये ‘क ख ग’ पढ़ना शुरू किया था मैंने़ घरवाले भी कहें बहुत तेज है बिटिया, खूब पढ़ायेंगे. घर-परिवार का नाम रोशन करेगी. सीबीएससी बोर्ड से 10वीं, 12वीं पास की.
रांची विवि से बीए, ओडिशा से मास्टर और विनोबा भावे से बीएड भी किया, फिर टेट भी पास किया. पढ़ते-पढ़ते मैं और पढ़ाते-पढ़ाते घरवाले थक गये. कहां गयी सारी पढ़ाई. नौकरी कहीं नहीं मिल पायी. पता नहीं वह एक दिन कब आयेगा, जब बेरोजगारी खत्म हो जायेगी.
किस जाल में फंस गये. जब पढ़ने में अव्वल रही, सभी परीक्षाएं पास की, तो नौकरी क्यों नहीं लगी? अब तो अगल-बगल की आंखें भी कहती हैं कि तुमसे अच्छे तो हम हैं कि ‘क ख ग’ भी नहीं पढ़ा, लेकिन पैसे रुपये से घर भरा पड़ा है. उनकी आंखों से बोलती बातें दिल में लगती हैं तो सोचती हूं कैसा मनहूस दिन था, जो मैंने ‘क ख ग’ पढ़ना चाहा था़
प्रीति कुमारी, ई-मेल से
