रवींद्रनाथ टैगोर ने मातृभाषा की तुलना मातृ दुग्ध से की थी़ लेकिन आज झारखंड में मातृभाषा (बांग्ला) का अस्तित्व मिटने की कगार पर है. यह स्थिति तब है जब राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत के अनुच्छेद 350क में प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा देने का वर्णन है़ साथ ही अंगीकृत बिहार राजभाषा अधिनियम के तहत बांग्ला को द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्राप्तहै और झारखंड में बांग्ला भाषा-भाषी की संख्या लगभग 23 लाख है.
इसके बावजूद सरकार हमें छलने का काम कर रही है. विगत पांच वर्षों से नोनीहाट बांग्ला मध्य विद्यालय में बांग्ला पठन-पाठन हेतु पदाधिकारी से लेकर मंत्री तक प्रयास करने के बावजूद अभी तक किसी के कान में जूं तक नही रेंगा है. हद तो इस बात की है कि मुख्यमंत्री जनसंवाद केंद्र में बारंबार शिकायत करने के बावजूद अभी तक संतोषजनक जवाब नहीं मिल पाया है. कृपया इस ओर ध्यान दें.
सागरिका सेन, नोनीहाट
