आर्थिक सुधारों के पच्चीस साल

अनुपम त्रिवेदी राजनीतिक-आर्थिक विश्लेषक जुलाई, 1991 में ‘देश की आर्थिक आजादी’ का सूत्रपात हुआ था. इस वर्ष देश को गरीबी और पिछड़ेपन की जंजीरों से मुक्त करनेवाले ऐसे दूरगामी निर्णय लिये गये थे, जिन्होंने देश को विकास की राह पर अग्रसरित किया था. इस वर्ष का महत्त्व वे जानते हैं, जिन्होंने 90 के दशक के […]

अनुपम त्रिवेदी
राजनीतिक-आर्थिक विश्लेषक
जुलाई, 1991 में ‘देश की आर्थिक आजादी’ का सूत्रपात हुआ था. इस वर्ष देश को गरीबी और पिछड़ेपन की जंजीरों से मुक्त करनेवाले ऐसे दूरगामी निर्णय लिये गये थे, जिन्होंने देश को विकास की राह पर अग्रसरित किया था.
इस वर्ष का महत्त्व वे जानते हैं, जिन्होंने 90 के दशक के पहले के भारत को जिया है. देश की हालत बुरी थी. 45 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे थे. देश की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) 22 लाख करोड़ थी (आज यह छह गुनी ज्यादा लगभग 130 लाख करोड़ है). मुद्रा-स्फीति, वित्तीय घाटा, भुगतान-असंतुलन सभी अपने रिकाॅर्ड स्तरों पर थे.
यह वह समय था, जब देश में लाइसेंस-परमिट राज था. उद्यमियों को उत्पादन करने के लिए लाइसेंस लेना होता था और सीमेंट, मिट्टी के तेल जैसी चीजें परमिट और राशन पर मिलती थीं. एक अदने से लैंडलाइन फोन के लिए लंबा इंतजार या स्थानीय सांसद की संस्तुति चाहिए होती थी. एक बजाज चेतक स्कूटर लेने के लिए लंबी प्रतीक्षा-सूची थी. एक से दूसरे शहर बात करने के लिए 2-4 घंटे ट्रंक-काॅल बुक कर इंतजार करना पड़ता था. आज अनगिनत चैनलों के अभ्यस्त इस देश में तब सिर्फ ‘दूरदर्शन’ ही था. आज की पीढ़ी को यह बात आश्चर्य-जनक लगेगी, पर यह मात्र 25 साल पहले की हकीकत थी.
यहां तक हम पहुंचे थे नेहरू की समाजवादी नीतियों का अनुसरण करके, जिनके परिणामस्वरूप 1951 से 1980 के बीच देश की आर्थिक-वृद्धि की दर औसतन 3.5 प्रतिशत रही थी. नेहरू के दिखाये रास्ते पर चलते हुए कोटा-परमिट में उलझा देश अस्सी का दशक आते-आते थक गया था.
1985 में परिस्थितिवश प्रधानमंत्री बने युवा राजीव गांधी ने देश की नीतियों को बदलने का प्रयास शुरू किया. बड़े पैमाने पर लाइसेंस खत्म किये गये और तकनीकी और पूंजीगत आयात के रास्ते खुलने शुरू हुए. पर, उसके लिए विदेशी मुद्रा की जरूरत थी, जो हमारे पास थी ही नहीं. सोवियत रूस पर हमारे लगभग पूर्ण आश्रित होने से स्थिति ऐसी हो गयी कि जब सोवियत-संघ का 1989 में विघटन, हुआ तब हम लगभग अनाथ हो गये और हमारे विदेश-व्यापार का मुख्य स्रोत सूख गया.
1989 में ही सरकार बदली, पर आर्थिक हालात सुधारने और गहराते भुगतान-संतुलन को संभालने के बजाय वह मंडल के बवंडर में उलझ गयी. 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिरी और चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने. उनकी सरकार भी कुछ महीने ही चली. राजनीतिक अस्थिरता ने देश में अनिश्चितता का माहौल बना दिया. 1991 में मध्यावधि चुनाव हुए.
21 मई को जब 221 सीटों पर मतदान हो चुका था, राजीव गांधी की दुखद हत्या कर दी गयी. बाकी बची सीटों पर मिली सहानुभूति से कांग्रेस आम-चुनाव जीत गयी. 21 जून, 1991 को दुख के माहौल में शरद पवार की दावेदारी को दरकिनार कर अनुभवी, पर देश के लिए लगभग अनजान, पीवी नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलायी गयी. यह एक कांटो भरा ताज था. नये-नये बने प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने अपने शपथ-ग्रहण के मात्र दो हफ्तों में ही ऐसे निर्णय लेने शुरू किये, जो आनेवाले समय में मील के पत्थर साबित हुए. देश की मुद्रा का अवमूल्यन किया गया और एक महीने के अंदर आये बजट में व्यापार और उद्योग नीति को लेकर दूरगामी बदलाव किये. इन निर्णयों ने देश को लाइसेंस-परमिट राज के चंगुल से निकल कर एक स्वस्थ बाजार आधारित अर्थव्यवस्था बनाने का शुभारंभ किया.
दरअसल, ये सुधार इसलिए हुए, क्योंकि हम चौतरफा आर्थिक संकटों में घिरे हुए थे. 1991 में हुए खाड़ी-युद्ध ने तेलों के दाम बढ़ा दिये. हमारे पास मात्र दो हफ्ते के आयात की विदेशी मुद्रा बची थी. भुगतान-संतुलन को लेकर सरकार के सामने करो या मरो की स्थिति आ गयी थी.
लगभग दिवालिया हो चुके देश ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) से ऋण की गुहार लगायी. आइएमएफ ने 2.2 अरब डाॅलर ऋण की सहमति तो दी, पर साथ में आर्थिक-सुधारों की शर्तें भी लगा दी, जो ऋण लेने के लिए भारत सरकार को माननी ही थीं. वे तीन शर्तें थीं : उदारीकरण (अर्थात् निवेश के लिए नियमों का सरलीकरण), निजीकरण (शेयरों के विनिवेश या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को निजी-क्षेत्र के लिए खोलना) और वैश्वीकरण (देश के बाजार को वैश्विक बाजार से जोड़ना). इन शर्तों को मानने के साथ ही देश को अपना 67 टन सोना भी बैंक ऑफ इंग्लैंड में गिरवी रखना पड़ा.
यह 1991 का भुगतान संकट ही था, जिसने हमारी तत्कालीन सरकार को आर्थिक सुधारों के लिए मजबूर किया.इस कार्य का श्रेय उस समय के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव और वित्त-मंत्री डाॅ मनमोहन सिंह को दिया जाता है, लेकिन उन्हीं की पार्टी इसका श्रेय राजीव गांधी को देती है. दरअसल, यह कहना मुश्किल है कि कोई एक या दो व्यक्ति इन आर्थिक सुधारों के लिए जिम्मेवार थे. अगर आइएमएफ ने कड़ी शर्तें न लगायी होतीं, तो क्या हम इन सुधारों को लागू करते? क्या आइएमएफ को इसका श्रेय देना चाहिए?
सच तो यह भी है कि आर्थिक सुधारों का ब्लूप्रिंट तो 1990 में ही बन गया था. नयी सरकार ने सिर्फ इसे लागू करने का ही काम किया. और इस ब्लूप्रिंट के जनक थे विलक्षण डाॅ सुब्रमनियन स्वामी, जो पूर्व की चंद्रशेखर सरकार में वाणिज्य और कानून मंत्री थे. और ये स्वामी ही थे, जिन्होंने मंत्री रहते आइएमएफ को दो बिलियन डाॅलर कर्ज देने के लिए राजी किया था. इसके लिए उन्होंने अमेरिका पर दबाव डाला था कि वह हमें आइएमएफ से ऋण दिलाये. बदले में उन्होंने खाड़ी-युद्ध के दौरान अमेरिकी लड़ाकू विमानों को भारत में ईंधन भरने के लिए लैंडिंग-राइट देने का वादा किया था.
अब आप तय कीजिये की श्रेय किसे देंगे, पर यह तो तय है कि 1991 के आर्थिक सुधारों ने देश की अर्थव्यवस्था और हमारे भविष्य के लिए संजीवनी का काम किया और हमें विकास की राह पर आगे बढ़ाया. इसीलिए 1991 का वह साल हमारी दूसरी आजादी का प्रतीक बन गया.

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