चीन में चलन है कि भारत के बारे में कोई कटूक्ति करनी हो तो शासन के शीर्ष से न कह कर, सरकारी नियंत्रण वाले मीडिया के जरिये व्यंग्य वाण छोड़ा जाता है, ताकि बाद में नेताओं की मुलाकात हो तो ऐसी कटूक्तियों से खुद को अलग करना आसान हो. इस बार भी चीन के सरकारी अखबार के जरिये दोष मढ़ा गया है कि चीन भारत को राजनीतिक ही नहीं, आर्थिक परिप्रेक्ष्य में भी महत्वपूर्ण मान कर चलता है, और दोनों देशों के लिए जरूरी है कि परस्पर व्यावसायिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए काम करें, लेकिन भारत अब भी 1962 की युद्ध वाली यादों से संचालित हो रहा है,
इसीलिए परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में प्रवेश के मामले में चीन सहित कुछ देशों की आपत्तियों का जवाब न देकर भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह राय बनाने में लगा है कि चीन उसकी सदस्यता में बेवजह अड़ंगे लगा रहा है. जबकि, हकीकत यह है कि चीन भारत के प्रति पुरानी शत्रुता तो नहीं छोड़ पा रहा है, अन्यथा वह समझ पाता कि अमेरिका के साथ एटमी करार होने के बाद भारत के बारे में इस तर्क को हवा देने का कोई खास मतलब नहीं कि इसने एनपीटी (परमाणु अप्रसार संधि) पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं. यह चीन के मन में भारत के खिलाफ भरा ‘जहर’ ही है, जो उससे संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद के मुद्दे पर वीटो करवाता है और भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र मानने से इनकार कराता है.
दरअसल, चीन अपनी सीमाओं के राजनीतिक विस्तार की 19वीं सदी वाली मानसिकता से उबरा नहीं है. चीन की यही मनोग्रंथि उसे विदेश-संबंधों के मामले में भारत पर अतीतजीवी होने के आरोप लगाने के लिए प्रेरित कर रही है, अन्यथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बयान सुनने से उसके कान नहीं चूकते. हाल में एक इंटरव्यू में प्रधानमंत्री से पूछा गया कि क्या एनएसजी में भारत की सदस्यता के मसले पर चीन को राजी करना संभव होगा? जवाब में उन्होंने एक बड़ी महीन बात कही कि ‘विदेश नीति का मतलब किसी देश का माइंडसेट बदलना नहीं होता. इसका अर्थ होता है बातचीत के साझा बिंदुओं की तलाश करना. हमें हर देश के साथ मिल-बैठ कर बात करनी होती है और यह एक सतत जारी रहनेवाली प्रक्रिया है.’ प्रधानमंत्री की इस बात से जाहिर है कि चीन हो या कोई और देश, भारत ने विदेश-नीति के मामले में अपना दिमाग खुला रखा है, जिस पर किसी देश के साथ अतीत में हुए कड़वे अनुभवों का बोझ नहीं है.
