आतंकवाद और राजनीति

आतंकवाद शब्द से मन में पहली तसवीर मुंह पर कपड़ा लपेटे और हथियार उठाये लोगों की बनती है. शायद इसीलिए कहा जाता है कि आतंकवाद का कोई चेहरा नहीं होता और वह अपने को हथियारों के बूते ही जताता है. लेकिन यह बात भी ध्यान रखनी होगी कि आतंकवाद हथियार से पहले एक विचार है, […]

आतंकवाद शब्द से मन में पहली तसवीर मुंह पर कपड़ा लपेटे और हथियार उठाये लोगों की बनती है. शायद इसीलिए कहा जाता है कि आतंकवाद का कोई चेहरा नहीं होता और वह अपने को हथियारों के बूते ही जताता है.
लेकिन यह बात भी ध्यान रखनी होगी कि आतंकवाद हथियार से पहले एक विचार है, जो सूचना-प्रौद्योगिकी के मौजूदा युग में अपने पनपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां कहीं भी तलाश सकता है. आतंक के विचार को अपने लिए ‘स्लीपर सेल’ हर जगह मिल जा रहे हैं.
यही बात हैदराबाद में आतंकवादी मंसूबे वाले कुछ युवकों की धड़पकड़ के बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) भी कह रही है. एनआइए के मुताबिक, गिरफ्तार युवकों के पास से न केवल हथियार, बल्कि ऐसे सबूत भी मिले हैं कि उनके तार सीरिया से जुड़े हैं, जहां इसलामिक स्टेट (आइएस) ने अपनी स्वतंत्र हुकूमत कायम कर रखी है.
ये नवयुवक सीरिया या इराक नहीं जाना चाहते थे, बल्कि उनका इरादा आइएस के इस विचार पर अमल करने का था कि दुनियाभर में ‘शरीयत’ का शासन लागू करने से पहले दुनिया को विधर्मियों से मुक्त करना होगा. इसी खतरनाक सोच से प्रेरित होकर ये नवयुवक हैदराबाद में ईद पर आतंकी हमले करना चाहते थे. यदि एनआइए के ये दावे सच हैं, तो निश्चित ही इस एजेंसी ने अपनी चौकसी से एक बड़ी वारदात को टाल दिया है. आतंकी हमलों को अंजाम देनेवालों का कोई स्थायी ठिकाना नहीं होता. ऐसे में ऐसे हमलों को रोकने का सबसे कारगर तरीका निरंतर चौकसी ही हो सकता है.
अगर एनआइए ने अपनी चौकसी से एक बड़े हमले को टाल दिया है, तो बेहतर होगा कि इन गिरफ्तारियों को अपने राजनीतिक हितों के चश्मे से न देखा जाये. एमआइएम के प्रमुख एवं हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी फिलहाल यही करते प्रतीत होते हैं. उन्हें लगता है कि पकड़े गये युवक निर्दोष हैं और वे उन्हें कानूनी सहायता मुहैया कराना चाहते हैं.
लगता है कि सांसद होने के बावजूद भारतीय न्याय-व्यवस्था पर उनका भरोसा कमजोर है या आतंकवाद को भी वे अपराध के अन्य मामलों जैसा ही मानते हैं. अच्छा यही होगा कि ऐसे मामलों को राजनीतिक रंग न देकर, जांच एजेंसियों और न्याय-व्यवस्था को अपना काम करने दिया जाये.

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