शांतिपीठ व वेतन आयोग

दुलारे बाबू की पत्नी शांति गुजर गयी. दुलारे बाबू दहाड़े मार-मार कर रोये. हाय मेरी तो दुनिया ही उजड़ गयी. शव यात्रा में बड़ी संख्या में शामिल हुए लोगों को देख कर दुलारे बाबू बहुत गदगद थे ही. कई बार पीछे मुड़ कर उन्होंने शव यात्रा की कई तसवीरें लीं और आखिर में मृत पत्नी […]

दुलारे बाबू की पत्नी शांति गुजर गयी. दुलारे बाबू दहाड़े मार-मार कर रोये. हाय मेरी तो दुनिया ही उजड़ गयी. शव यात्रा में बड़ी संख्या में शामिल हुए लोगों को देख कर दुलारे बाबू बहुत गदगद थे ही. कई बार पीछे मुड़ कर उन्होंने शव यात्रा की कई तसवीरें लीं और आखिर में मृत पत्नी के साथ सेल्फी भी ले ली. दुलारे बाबू की पत्नी थीं भी बहुत सोशल. हर आते जाते को ‘भाई साहब नमस्ते’ करना नहीं भूलती थीं. वह बात अलबत्ता दूसरी थी कि मोहल्ले के पचास फीसदी विवाद उनकी चुगलियों के कारण ही पनपते थे.

शांतिपाठ में एक बड़ा सा शामियाना और ढेरों कुर्सियां लगीं, ताकि गठिया और अर्थराइटिस आदि नाना प्रकार की व्याधियों से पीड़ित सीनियर सिटीजन को बैठने में कोई दिक्कत न हो. फिर शांतिपाठ तो सीनियर सिटीजन के लिए टाइम पास करने का बेहतरीन मौका जो होता है. कई सीनियर तो अखबार में यूं ही िकसी की श्रद्धांजलि सभा का विज्ञापन देख कर ही पहुंच जाते हैं. भई! िकसी की मृत्यु पर अफसोस के लिए उससे जान-पहचान की क्या जरूरत?

अब तो सेवेंथ पे कमीशन भी आ गया है. हमें तो कोई फायदा नहीं हुआ. देखना इसी बहाने महंगाई बढ़ जायेगी. अचानक श्रीवास्तव जी को दुलारे बाबू की पत्नी की याद हो आयी. कहने लगे- बड़ी नेक थीं जी. जैसे ही खबर मिली नहीं कि कोई बीमार-ठिमार है, दौड़ी चली आयीं. तन-मन से सेवा में लग गयीं. वर्मा जी को याद आया कि वह पिछले साल सीढ़ियों से गिरे थे. शांति जी उन्हें अस्पताल देखने आयी थीं.

तभी जोशी जी की जिज्ञासा जगी कि शांति जी को आखिर हुआ क्या था? दुलारे जी ने बताया कि कुछ नहीं हुआ था. रात को अच्छी भली सोयी हुई थीं. सुबह अचानक सीने में दर्द उठा. अस्पताल ले जाने के लिए एम्बुलेंस बुलायी गयी. हम अस्पताल पहुंचे. डॉक्टर ने एक नजर देखा और फिर ‘नो मोर’ बता दिया. ऐसे प्रश्न का उत्तर दुलारे बाबू पिछले दो दिन में हजार बार दे चुके थे. आंख में आंसू भी सूख चुके थे उनके. जबरदस्ती रोने का प्रयास भी बेकार गया. फिर भी पास बैठे हुए ने उन्हें तसल्ली दी. उनकी चाची भी ऐसे ही गुजरी थीं. बड़ी नेक आत्माएं होती हैं. जरूर पुण्य के काम किये होंगे. शर्मा जी के साले साहब तो जी बस बनारस के बहाने स्वर्ग के सफर के लिए निकल गये. कनौजिया जी के चचिया ससुर बेचारे इंसुलिन लगाना भूल गये थे और… इसके आगे का वृत्तांत उन्होंने एक्शन में बताया. गर्दन झटके से टेढ़ी की और दोनों हाथ ऊपर की ओर उठा दिये.

यह सिलसिला चलता रहता अगर बंदे ने दिवंगता के हाथ के बने भोजन की प्रशंसा शुरू न की होती. उद्देश्य था कि जिसके लिए आये हो, उसी पर फोकस रहो. लेकिन बंदे की बात पर चावला जी ने काट लगायी. भोजन तो उनकी अमृतसर वाली चाची भी बहुत अच्छा बनाती थीं. पराठे बनाते हुए चली गयीं. सिद्दीकी साहब ने एम्बुलेंस सेवाओं को कोसना शुरू कर दिया. ये एम्बुलेंस वाले पेट्रोल ही नहीं भरा कर रखते. चतुर्वेदीजी ने प्रतिवाद किया. अरे भाई, भोरे-भोरे ठीक पांच बजे कौन माई का लाल दो मिनट के नोटिस पर आपके घर पहुंच सकता है? तभी किसी को एयर टैक्सी एम्बुलेंस की याद आयी. हमारे मामा… को तो एयर टैक्सी एम्बुलेंस से अस्पताल ले जाया गया, फिर भी वे चल बसे.

शांतिपाठ खत्म होने का ऐलान हुआ. चाय, बिस्कुट, मट्ठियां और दिवंगता की खास पसंद पेस्ट्री मेजों पर सजी थीं. मिश्रा जी ने प्लेट भरी और बोले- हां, तो फिर क्या है सेवेंथ पे कमीशन में…

सारे शोकाकुल सीनियर सिटीजन कान लगा कर सुनने लगे.

वीर विनोद छाबड़ा

व्यंग्यकार

chhabravirvinod@gmail.com

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