नहीं थम रहे सड़क हादसे!

किसी भी राष्ट्र में सड़कें आर्थिक व सामाजिक विकास की धुरी होती हैं. यह न सिर्फ भौतिक वस्तुओं की ढुलाई के लिए एक सहायक परिपथ तैयार करता है, बल्कि लोगों को भी सस्ती और घर-घर पहुंचाने तक की सेवा प्रदान करता है. लेकिन विकास का केंद्र बन गयी यही सड़कें, जब नागरिकों के खून से […]

किसी भी राष्ट्र में सड़कें आर्थिक व सामाजिक विकास की धुरी होती हैं. यह न सिर्फ भौतिक वस्तुओं की ढुलाई के लिए एक सहायक परिपथ तैयार करता है, बल्कि लोगों को भी सस्ती और घर-घर पहुंचाने तक की सेवा प्रदान करता है. लेकिन विकास का केंद्र बन गयी यही सड़कें, जब नागरिकों के खून से लथपथ होने लगें, तो सवालों के साथ चिंताएं भी वाजिब हो जाती हैं.
भारत में हर घंटे होने वाले 57 सड़क हादसों में औसतन 17 लोग काल के गाल में समा रहे हैं. 2015 में देश में कुल 5,01,423 सड़क दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 1,46,133 लोगों की जान चली गयी. इस तरह, देश भर में प्रतिदिन हुए 1374 सड़क दुर्घटनाओं में रोजाना 400 लोगों की मौत हो गयी. 2014 की तुलना में 2015 में सड़क दुर्घटनाओं में 2.5 फीसदी बढ़ोतरी हुई. आज देश के हर कोने से सड़क दुर्घटना के मामले प्रकाश में आ रहे हैं.
यातायात नियमों की अनदेखी व जागरूकता के अभाव के कारण सड़क दुर्घटनाएं देश की बड़ी सामाजिक समस्या बन गयी हैं. हर एक व्यक्ति गंतव्य पहुंचने को लालायित है, बशर्ते इसकी कोई भी कीमत उन्हें चुकानी पड़े. आखिर अपने जीवन और समाज के प्रति इतनी लापरवाही क्यों?
सुधीर कुमार, गोड्डा

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