बेरोजगारी की समस्या बढ़ती जा रही है. चुनाव के दौरान हर राजनीतिक दल युवाओं को रोजगार देने का वादा करता है. हालत यह है कि नौकरी के लिए जो रिक्तियां निकलती हैं, उनकी बार-बार समीक्षा होती है.
हालांकि जो प्रार्थी पहले फार्म भर चुका होता है, उसे फीस की तो छूट दी जाती है लेकिन नेट का खर्च तो देना पड़ता है. सबसे दुखद बात है परीक्षा केंद्र का दूर होना. इसका सीधा-सा मतलब है कि प्रशासन गृह जिले में नकल रहित परीक्षा कराने में असमर्थ है और खामियाजा भुगतता है परीक्षार्थी. यह बेरोजगारों पर दोहरी मार है.
श्वेता उपाध्याय, रांची
