-हरिवंश- इस बार शब्द संसार स्तंभ का नाम प्रेरणा होना चाहिए. 1960 से पहले मदाम क्यूरी पुस्तक आयी थी. यह पुस्तक लिखी, उनकी पुत्री यू.क्यूरी ने. मां और बेटी दोनों को नोबेल पुरस्कार, यह भी रेयर चीज है. मदाम क्यूरी की बेटी ने अपनी मां पर यह पुस्तक लिखी थी. उस पुस्तक में कुछ मार्मिक […]
By Prabhat Khabar Digital Desk | Updated at :
-हरिवंश-
इस बार शब्द संसार स्तंभ का नाम प्रेरणा होना चाहिए. 1960 से पहले मदाम क्यूरी पुस्तक आयी थी. यह पुस्तक लिखी, उनकी पुत्री यू.क्यूरी ने. मां और बेटी दोनों को नोबेल पुरस्कार, यह भी रेयर चीज है. मदाम क्यूरी की बेटी ने अपनी मां पर यह पुस्तक लिखी थी. उस पुस्तक में कुछ मार्मिक प्रसंग हैं, जिन पर आधारित है, यह स्तंभ.
सन 1891 में सोरबान विश्वविद्यालय में पढ़ने आयीं, मदाम क्यूरी. तब हेमंत ऋतु था. फ्रेंच विद्यार्थियों ने देखा, एक पोलिश तरूणी आयी. विज्ञान की अंधेरी सी कक्षा में. उसके कपड़े मामूली थे. पर वह सौंदर्य से भरी. मुखमंडल पर शांतिमय आभा. लज्जा और लालिमा. पोलिश भाषा में वह ‘मार्या’ थी. फ्रेंच भाषा में वह ‘मारी’ हो गयीं. वह अपनी पढ़ाई में डूबी होतीं. उसके सौंदर्य को देख अनेक युवकों ने मित्रता करनी चाही. पर वह तो अपना जीवन विज्ञान को समर्पित कर चुकी थीं.
किराये पर उसने एक सुविधाविहीन कोठरी ली. बचपन से ही उसने पाया कि जीवन संघर्षमय है. पेरिस आने के पहले फी जुटाने के लिए वह एक संपन्न पोलिश परिवार में बच्चों की गवर्नेंस रहीं थीं. जीवन गुजारने के लिए मामूली पैसे उपलब्ध थे. वह कोयला का खर्च बचाती. सर्दियों में अंगीठी नहीं जलाती थीं, पर रात-रात भर बैठकर पढ़ती थी. डबलरोटी और मक्खन पर महीनों गुजर जाते थे. अंडा या सेव दुर्लभ थे. पौष्टिक भोजन न मिलने से वह बेहोश हो जाती. फिर भी उसके संकल्प और साधना अटूट थे. फ्रांस के ही एक मेधावी वैज्ञानिक प्येर क्यूरी उसके जीवन में आये. आकर्षक व्यक्तित्व के धनी. 1894 में प्रयोगशाला में दोनों मिले. कुछ महीनों बाद प्येर ने विवाह का प्रस्ताव रखा. उसे दस माह लगे विचार करने में. अंतत: उसने यह प्रस्ताव मान लिया. मारी, मदाम मारी क्यूरी बन गयीं. दोनों के लिए अभाव के दिन थे. घर में मामूली चीजें थीं. पर प्रयोगशाला में दोनों डूबे रहते. मारी ने फिजिक्स और केमेस्ट्री में मास्टर आफ साईंस की उपाधि प्राप्त की. फिर डाक्टर की उपाधि के लिए पढ़ाई शुरू की. पति-पत्नी दोनों ने शोध के लिए विषय तय किया, यूरेनियम से किरणें क्यों निकलतीं हैं, इसका स्रोत क्या है.
पर कोई प्रयोगशाला थी नहीं. गोदाम में इस महान आविष्कार की शुरूआत हुई. मारी यूरेनियम किरणों के रहस्य खोजने में डूबीं. पाया थोरियम से भी स्वत: किरणें निकलतीं हैं. फिर उन्होंने इसका नाम दिया रेडियोएक्टिविटी. इस तरह एक नया पदार्थ ढूंढ़ा. नये रहस्य का उद्घाटन. पति प्येर भी इस आविष्कार में साथ थे. इस तरह 1898 जुलाई में एक विशेष तत्व की खोज हुई. मारी ने अपने देश पोलैंड के नाम पर इसे पोलोनियम नाम दिया. उसी वर्ष दिसंबर में दूसरा तत्व मिला. उसका नाम पड़ा, रेडियम. यह प्रयोगशाला सुविधाविहीन था. गरमियों में गरम भट्ठी. सर्दियों में बर्फ का घर.
न इनके पास अतिरिक्त पैसा था, न कोई सरकारी सहायता थी. आधी-आधी रात तक दोनों खोज और शोध में डूबे रहते. पर बाधाओं ने उन्हें और मजबूत बनाया. अंतत: एक रात गोदाम के अंधकार में रेडियम झिलमिलाया. दोनों झूम उठे. 1902 की वह रात अमर हो गयी. रातों रात क्यूरी दंपती विश्व प्रसिद्ध हो गये.
पर उनका निजी जीवन अभावों से भरा था. बेटी इरेन पैदा हो चुकी थी. दोनों को कहीं और नौकरी ढूंढ़नी पड़ी. उधर रेडियम ने पूरे संसार में हलचल पैदा कर दी. चिकित्सा विज्ञान की हस्तियां घोषित कर चुकी थी कि कैंसर को रेडियम से ही बस में किया जा सकता है. दुनिया के बड़े-बड़े व्यापारी-कंपनियां प्येर-मारी दंपत्ति के पीछे पड़ गयीं. मुंहमांगा प्रस्ताव, पैसे.
इधर दोनों जीवन की बुनियादी जरूरतों से जूझ रहे थे. दोनों का सपना था, बढ़िया प्रयोगशाला बनाना. जीवन कष्ट और कठिनाइयों से गुजरा था. कई सपने अधूरे थे. अभावों से भरा पारिवारिक जीवन. बच्चों के भविष्य की चिंता. एक श्रेष्ठ प्रयोगशाला की कल्पना. उधर रेडियम शोध के बदले बड़े प्रस्ताव. बस सिर्फ हां भर कहना था और जीवन बदल जाता. दोनों पति-पत्नी, के बीच बातचीत हुई. अंतत: मारी ने जो कहा, वह इतिहास में हमेशा स्मरण रहने वाला प्रेरक प्रसंग है. मारी ने कहा, ‘‘सत्य के अन्वेषक को अपनी खोजों का सही परिणाम मुफ्त प्रकाशित कर देना चाहिए.
फिर रेडियम से तो कैंसर जैसे असाधारण रोगों का इलाज होनेवाला है. ऐसी हालत में व्यापारिक दृष्टि से इस पर विचार करना भी वैज्ञानिक भावना के प्रतिकूल होगा.’’ इस तरह यह शोध सामने आया. फिर 1903 में क्यूरी दंपती को रेडियोएक्टिविटी के लिए भौतिक विज्ञान के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
क्यूरी सचमुच ऋषि परंपरा की विदुषी थीं. घोर अभाव में जीते हुए एक दंपती ने अपने ज्ञान को पैसों के लिए नहीं बेचा. मानव कल्याण के लिए मुफ्त में बांटा. यह चारित्रिक विशेषता ही विद्वता को एक नयी आभा और ऊंचाई देती है. यह चरित्र ही किसी देश, संस्था या व्यक्ति को महान और विलक्षण बनाता है.
आज भारत में इस चरित्र के कितने विद्वान हैं? अभावों में जीते पर साधना में डूबे? जब सारी दुनिया सोती हो, तब भी वे शोध में डूबें हों. ठिठुरते हुए या गरमी में झुलसते हुए. फिर भी अपने आदर्श से समझौता न करे. प्येर-मारी विश्वप्रसिद्ध हो गये. दुनिया उनको बुलाने के लिए आतुर. घर पर मिलनेवालों की भीड़. वे उब गये. मारी ने लिखा, हमारा शांतिपूर्ण कर्ममय जीवन विध्वस्त हो गया है. इतने मशहूर वैज्ञानिक पर ख्याति, लोकप्रियता के उन्माद से अछूते.
एक बार फ्रांस के राष्ट्रपति ने उन्हें एलीसी पैलेस में दावत दी. दावत के बाद राष्ट्रपति लोबे की पत्नी ने मारी से कहा, ग्रीस के राजा से आपका परिचय करवा दूं? मारी ने भोलेपन से कहा, क्या इसकी विशेष आवश्यकता है? सत्ता, प्रसिद्धि और चकाचौंध की दुनिया से दूर, ये दोनों वैज्ञानिक शोध की अपनी दुनिया में जुटे थे. 1906 अप्रैल में दुर्भाग्य आया. प्येर एक सड़क दुर्घटना में नहीं रहे. मारी की तो जैसे दुनिया उजड़ गयी. पर अद्भुत स्वाभिमान था, इस महिला में. फ्रेंच सरकार ने मारी और उसके बच्चों के गुजारे के लिए पेंशन की घोषणा की. पर आत्मसम्मान की प्रतिमूर्ति मारी ने उत्तर दिया, मुझमें अभी काम करने की शक्ति शेष है. बच्चों का और अपना प्रबंध मैं स्वयं कर लूंगी. इस तरह सधन्यवाद, उन्होंने फ्रांस सरकार का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया.
यह पढ़ते हुए मेरे अंदर सिहरन पैदा हुई. इंसान की यह ऊंचाई. यह आत्मस्वाभिमान. और कहीं दर्प या अहंकार भी नहीं. और अपने काम के प्रति यह समर्पण. ये दुर्लभ गुण हैं. भारतीय ऋषियों के बारे में यह सब पढ़ने-जानने को मिलता है. इस पैमाने पर देखें, तो भारत में आज कितनी बड़ी बौद्धिक दरिद्रता है. कितना बड़ा चरित्र का संकट है. यही नहीं 13 मई 1906 को सोरबान विश्वविद्यालय के विज्ञान विभाग ने उनके पति प्येर का रिक्त स्थान मदाम क्यूरी को देने का निश्चय किया. सर्वसम्मति से. वह विश्वविद्यालय में पहली महिला प्राध्यापिका नियुक्त हुई. प्येर के वृद्ध पिता ने पुत्रवधु को आशीष दी. गंभीरता से दायित्व समझाया.
सोरबान विश्वविद्यालय में मदाम क्यूरी के भाषण का पहला दिन. लोग उमड़ पड़े. बैठने की जगह नहीं थी. कयास था मदाम क्यूरी क्या बोलेंगी? फ्रेंच सरकार को धन्यवाद देंगी? विश्वविद्यालय को धन्यवाद देंगी? अपने पति प्येर के संबंध में कुछ बोलेंगी? परंपरा भी यही रही है कि पूर्व अधिकारी के विषय में प्रशंसा वचन कह कर बात आरंभ की जाये.
ठीक समय पर भाषण कक्ष के पीछे का द्वार खुला. अद्भुत कर्तलध्वनि हई. मदाम क्यूरी की भव्य और गरिमामय उपस्थिति. उन्होंने सबका अभिवादन किया. फिर चारों ओर स्तब्धता. क्या बोलेंगीं? कहां से बोलेंगी?भाषण वहीं से शुरू हुआ, जहां प्येर क्यूरी अधूरा छोड़ गये थे. मारी के चेहरे पर शिकन तक नहीं. अंदर-अंदर उन्होनें जो भी महसूस किया हो, पर उल्लेखनीय गरिमा से भाषण दिया. फिर चुपचाप लौट गयीं. फिर तो मदाम क्यूरी पर उपाधियों की बरसात होने लगी. 1911 में उन्हें पुन: नोबेल पुरस्कार मिला. रसायन शास्त्र में.
पहला विश्वयुद्ध शुरू हुआ. इस वैज्ञानिक का अद्भुत चेहरा दुनिया ने देखा. उन दिनों अस्पतालों में एक्स-रे व्यवस्था नहीं थी. घायल सिपाहियों के शरीर में कहां गोली, छर्रे लगें हैं, ढूंढ़ना मुश्किल था. मारी ने अभियान चलाया, अधिक से अधिक रेडियोलॉजिकल स्टेशन बनाने का. फ्रांस की महिलाओं ने उनकी मदद की. चंदा इकट्ठा किया. मोटर गाड़ी खरीदी. इसमें एक्स-रे का सामान रखा गया. इस गाड़ी का नामकरण हुआ रेडियोलॉजिकल कार. चलती फिरती प्रयोगशाला को लेकर मदाम क्यूरी अस्पतालों में सहायता पहुंचाने लगीं.
इस तरह मारी ने लिटिल क्यूरी के नाम से और भी एक्स-रे गाड़ियां बनवायीं. उन्हें दुनिया के कोने-कोने से बुलावा आने लगा. विश्वयुद्ध के चार वर्षों तक उन्हें एक्स-रे यंत्रों के सामने दिन-रात रहना पड़ा. रोगियों की मदद के लिए. वह जानतीं थीं, रेडियम उनके रक्त में घर कर रहा है. फिर भी वह समाज के लिए सक्रिय रहीं, अपना बचाव नहीं किया.
अंतत: 4 जुलाई 1934 को वह नहीं रहीं. इस अद्भुत महिला के जीवन से कितना कुछ आज भी देश-दुनिया के लोग सीख सकते हैं? पर अब कितने लोग उन्हें जानते हैं? याद करते हैं? क्या समाज के बदले हुए मूल्यों के कारण ऐसा हो रहा है?
हिंदी में पहली बार ‘नवनीत’ ने 1960 में इस पुस्तक का लंबा अंश प्रकाशित किया था. यह आलेख उसी पर आधारित है. अधिसंख्य अंश उसी लेख से इसमें हैं.