-हरिवंश-
संस्मरणों का संकलन है, ‘द पेंगुइन बुक आफ स्कूल डेज’. शीर्षक है ‘रिसेस’ (मध्यावकाश). लगभग 360 पेजों की पुस्तक. कीमत, 450 रुपये. पुस्तक का संपादन किया है, पलाश कृष्ण मेहरोत्रा ने. 1975 में जन्मे मेहरोत्रा ने सेंट स्टीफन, दिल्ली से पढ़ाई की. फिर वह दिल्ली स्कूल आफ इकॉनोमिक्स में पढ़े. ऑक्सफोर्ड गये. इसके बाद स्कूल शिक्षक बने. मेहरोत्रा की डिग्रियां, उन्हें बेहतर नौकरियां दिला सकती थीं. पर वह स्कूल शिक्षक हुए. मास्टरी प्रोफेशन, उन्होंने चुना. निश्चित रुप से यह उनका मनपसंद क्षेत्र रहा होगा. पढ़ाने के काम में वह इनवाल्व महसूस करते होंगे.
यह उनकी मजबूरी का काम नहीं था. इसका प्रमाण है, पलाश कृष्ण मेहरोत्रा द्वारा संपादित पुस्तक ‘रिसेस’. इस संग्रह में 50 लोगों के स्कूल के दिनों की स्मृतियां हैं. ऐसे लोगों के भी संस्मरण हैं, जो भारत के सर्वश्रेष्ठ चिंतक, मनीषी व सजर्क माने जाते हैं. लाल बिहारी डे, दयानंद सरस्वती, रवींद्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी, प्रेमचंद, जवाहर लाल नेहरू, आर के नारायण, सत्यजीत डे, एन तारा सहगल, वेद मेहता, आंद्रे बेते, नीरजा चौधुरी, विक्रम सेठ, अमित चौधुरी इत्यादि. पुस्तक में स्कूलों की स्मृतियां है, कविता के रुप में, लेखों के रुप में और कहानियों के रूप में. हम अपने जीवन में अनेक महत्वपूर्ण चीजें भूल जाते हैं. पर स्कूल के दिनों की स्मृतियां ताउम्र साथ रहती है. अच्छी या बुरी. हम उनसे मुक्त नहीं हो पाते. इन्हीं स्मृतियों का संग्रह है, इस पुस्तक में. शायद इस विषय पर पहला ऐसा संग्रह है.
स्कूलों में ही समाज का भविष्य गढ़ा जाता है. पर उन स्कूलों को लेकर समाज के अंदर मंथन नहीं होता. बल्कि स्कूल मास्टर दयनीय माने जाते हैं. पुस्तक की भूमिका में संपादक पलाश कृष्ण ने मशहूर लेखक डब्लू एच आडेन को उद्धृत किया है. आडेन खुद स्कूल मास्टर थे. आडेन ने कहा है, यदि, कहीं हर प्रोफेशन और व्यवसाय के लोगों को एक साथ खाने पर आमंत्रित किया जाये, तो स्कूल का अध्यापक अंतिम व्यक्ति होगा, जिसके बगल में या साथ में कोई बैठना चाहे. इस तरह स्कूल का अध्यापक समाज में हाशिए पर ही माना जाता है. जबकि स्कूल ही समाज के भविष्य की नींव हैं. स्कूलों को लेकर जो बहस और चिंता समाज में होनी चाहिए, वह नहीं है. ‘माइ गॉड डाइड यंग’ के लेखक षष्ठीब्रता ने अपने संस्मरण में स्कूलों में व्याप्त क्रूरता का भी वर्णन किया है. वह कहते हैं कि जो बच्चे पैथोलॉजिकल मॉन्स्टर (विकृत -अतिक्रूर) होते हैं, उनके लिए कुछ सीधे-साधे बच्चे साइकोलॉजिकल फॉडर (मानसिक चारा) होते हैं. खुद पलाश कृष्ण ने साढ़े तीन वर्ष पढ़ाया. वह भूमिका में कहते हैं, बच्चे अपने साथी बच्चों पर बेइंतहा क्रूरता बरतने में सक्षम हैं. बच्चे, अपने अध्यापकों के प्रति भी अत्यंत भावहीन और संवेदनहीन हो सकते हैं.
पलाश अपनी भूमिका में कहते हैं कि सेक्स्यूऐलिटी (लैंगिकता) भी स्कूल जीवन का अविभाज्य हिस्सा है. स्कूलों में ही अपनी सामाजिक शख्सीयत का अहसास होता है. कुछ स्कूलों के बारे में ऐसी धारणा है कि वहां क्लासलेस – कास्टलेस (वर्गविहीन जातिविहीन) माहौल है. लेखक विक्रम सेठ दून स्कूल से जुड़े अपने संस्मरण में कहते हैं कि वहां बच्चों को एक समान पॉकेट खर्च मिलता था. जाति कोई पूछता नहीं था. धर्म महत्वपूर्ण नहीं था. आप देश के किस हिस्से से हैं, यह अमहत्वपूर्ण था. आपका परिवार और सामाजिक हैसियत कोई मापदंड नहीं थे. पर देश में ऐसे स्कूल हैं कितने?
याद करिए, आजादी की लड़ाई के दिन और प्रसंग. एक तरफ गांधी का अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष था, तो दूसरी ओर साथ-साथ नये भारत के निर्माण का ब्लूप्रिंट भी. उन्होंने शिक्षा पद्धति नयी तालीम की कल्पना की. तमिलनाडु से लेकर देश के कई हिस्सों के जानेमाने शिक्षाविद इस नये प्रयोग में सेवा ग्राम, वर्धा में रहे. गांधी जी के साथ. विनोबाजी भी जुड़े रहे. लगातार इस बात पर बहस चलती रही कि आजाद भारत की शिक्षा पद्धति कैसी हो? जो हमारी धरती से जुड़ी हो, जो हमारी आबोहवा, संस्कार और मूल्यों के करीब हो. जो भारतीय मानस विकसित कर सके. गांधीजी की शह और प्रेरणा से ही क्षेत्रीय भाषाओं में भी शिक्षा में अद्भुत प्रयोग हुए. गिजूभाई ने ऐतिहासिक काम किये. वह ‘मूछों वाली मां’ कहलाये. असाधारण व्यक्तित्व के धनी. मौलिक अध्यापक. इस तरह प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा में गांधीजी की प्रेरणा से नये प्रयोग हुए. काशी विद्यापीठ की नींव आजादी की लड़ाई के दिनों में ही पड़ी, जहां से एक से बढ़ कर एक चरित्रवान राजनेता आये. जैसे लाल बहादुर शास्त्री, भोला पासवान शास्त्री वगैरह. इन शिक्षा केंद्रों में भारतीय तेज, प्रतिभा और चरित्र को निखारने, संवारने और विकसित करने का काम होता था. इस शिक्षा पद्धति का दर्शन ही अलग था.
यह भारत के उत्थान, समाज सुधार और पुनर्जागरण से प्रेरित था. खंडित और गुलाम भारतीय मानस को श्रेष्ठ बनाने की शिक्षा, दूसरी ओर मैकाले की पद्धति थी, जिसका दर्शन था, भारतीय शरीर-खून में, अंगरेज मानस पैदा करना. आजादी के बाद भारत आंख बंद कर मैकाले शिक्षा पद्धति के रास्ते चल पड़ा. गांधी को भुला कर- इग्नोर कर. बहुत वर्षों बाद बिहार में मुचकुंद दूबे के नेतृत्व में समान शिक्षा आयोग बना. पर उसकी क्या स्थिति है? नहीं मालूम. आज भारत में चुनाव हो रहे हैं. क्या इन चुनावों में शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर कोई बहस या ब्लूप्रिंट है? जिस शिक्षा के गर्भ से नया भारत निकलना है, उस पर कहीं कोई चिंता है? गद्दी के भूखे नेता, पैसे के भूखे नेता, सत्ता के लिए कोई कुकर्म करनेवाले मूल्यविहीन नेता, क्या कभी देश के बुनियादी सवालों के बारे में भी सोचेंगे? दुनिया के लिए यह नॉलेज इरा (ज्ञान युग) का दौर है. इस दौर में जहां कीशिक्षा और स्कूल बेहतर होंगे, वही समाज आगे निकलेगा.
स्कूल हैं, क्यों? जैसे कुम्हार चाक पर बर्तन गढ़ता है, वैसे ही समाज और संसार में अच्छे मनुष्य गढ़ने की चाक हैं, स्कूल. यहीं शिक्षा दी जाती है. महज आजीविका चलाने के लिए नहीं, बल्कि अच्छे मूल्य, अच्छी शिक्षा, अच्छे संस्कारों से बच्चों को संपन्न करने के लिए. आज की शिक्षा पद्धति पर यह गंभीर आरोप है कि बच्चों की मौलिकता-उत्सुकता वहां खत्म हो जाती है. कल्पनाशीलता जड़ हो जाती है. उत्साह और आवेग ठंडे पड़ जाते हैं. इस तरह स्कूल बच्चों को टाइप्ड (निश्चित आकार का) बना देते हैं. अगर यह स्थिति है, तो इसे बदलने की कोशिश कहां है? स्कूल ही वह जगह है, जहां बचपन खत्म होता है. युवापन का आगमन होता है. स्कूल ही मस्तिष्क के विभिन्न अवयवों को जगाता है. इसलिए इन स्कूलों के बारे में समाज में विमर्श होना चाहिए. इस दृष्टि से यह उपयोगी पुस्तक है.
स्कूलों के बारे में कारखानों की तरह से नहीं सोचना चाहिए. कक्षाओं के बाहर की दुनिया भी महत्वपूर्ण है. एक बच्चा क्लास में अच्छा करता है या नहीं, इससे संकेत नहीं मिलता कि वह आगे जीवन में अच्छा या बुरा करेगा? रवींद्रनाथ टैगोर को स्कूल के पाठ्यक्रमों में रुचि नहीं थी, पर उनकी सृजनात्मक प्रतिभा निखरी. हिंदी के महान कवियों में से एक जयशंकर प्रसाद को औपचारिक शिक्षा नहीं थी, फिर भी वह अनमोल बन गये. इस तरह के अपवाद भी हैं. पर स्कूल, बच्चों को आमतौर पर जागरूक, उत्कृष्ट और ज्ञानसंपन्न बनाने के केंद्र हैं. जरूरी है कि स्कूलों के बारे में निरंतर सोचा-समझा जाये.
