बचपन में दादा-दादी भूकंप, बाढ़ वगैरह की की कहानियां सुनाया करते थे जो हम नयी पीढी के लोगों को काल्पनिक लगती थीं. परंतु पिछले कुछ दिनों से हमारे आंखों के सामने जो कुछ हो रहा है उसे अपने लफ्जों में बयान कर पाना कठिन है.
एक महीने के अंदर ही न जाने कितनी बार हमने भूकंप के झटकों का सामना किया. इसमें न जाने कितने लोगो की जाने गयीं और कितने लोग बेघर हुए. पता नहीं क्यों कुदरत बार-बार हमारी जिंदगी से खेल रही है. आज लोगों में दहशत है.
बार-बार कुदरत नेपाल जैसे छोटे से देश को तबाह करने पर तुल गयी है. भारत भी इससे अछूता नहीं है. ऐ कुदरत! बस इतनी सी बिनती है कि थोड़ा रहम कर और सोच उन बच्चों-बुजुर्गो के बारे में जो तेरी चपेट में आकरजिंदगी खो बैठे. आखिर क्या कसूर था उन निदरेष लोगों का? आज यह सवाल सब लोग तुझसे पूछ रहे हैं.
अमित केसरी, हजारीबाग
