पिछले दिनों मैं दफ्तर से घर वापस जा रहा था, तो सड़क पर अकेली जा रही एक लड़की को दो लड़कों के द्वारा छेड़ते हुए देखा. उनकी हरकत देख लड़की को सिर नीचा कर लेना पड़ा.पता नहीं इस हरकत से उन लड़कों को क्या हासिल हुआ, लेकिन लड़की ने जो सरलता दिखाई, वह काबिले-तारीफ है, लेकिन आज नहीं तो कल उसे इस प्रकार की ओछी हरकतों के खिलाफ गर्दन ऊंची करनी ही पड़ेगी.
सवाल यह भी उठता है कि आखिर उस लड़की का दोष ही क्या था, जो इन लड़कों की छींटाकशी को बरदाश्त कर रही थी? हमेशा लड़कियों को ही समय के साथ समझौता क्यों करना पड़ता है?
इन्हीं हरकतों की वजह से उन्हें जान तक क्यों देना पड़ता है? मेरे विचार से टीवी धारावाहिक, सिनेमा और इंटरनेट के बढ़ते व्यहार से समाज में विकृति पैदा हो रही है. समय रहते सचेत होना होगा.
नवीन कुमार सिन्हा, जमशेदपुर
